पत्रकारों के चरित्र-हनन का मामला पहुंचा DGP दरबार: सुरक्षा व डिजिटल फॉरेंसिक जांच की मांग...
पत्रकारों और एक्टिविस्टों को निशाना बनाने का आरोप: DGP के दरबार में पहुंचा मामला, सुरक्षा से लेकर डिजिटल फॉरेंसिक जांच तक की मांग |
सरगुजा में जनहित के मुद्दे उठाने वालों के खिलाफ चरित्र-हनन और धार्मिक उन्माद फैलाने का आरोप; अकील अहमद अंसारी सहित पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता |

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-
रायपुर/अंबिकापुर :- छत्तीसगढ़ में पत्रकारों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों के खिलाफ कथित चरित्र-हनन, व्यक्तिगत हमलों और सोशल मीडिया के जरिए धार्मिक वैमनस्य पैदा करने के आरोपों ने अब राजधानी रायपुर तक दस्तक दे दी है। मामले को लेकर छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP), पुलिस मुख्यालय, नवा रायपुर को विस्तृत शिकायत सौंपते हुए उच्च स्तरीय, निष्पक्ष एवं प्रभावमुक्त जांच तथा संबंधित लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की गई है।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि सरगुजा में गरीबों, आदिवासियों, महिलाओं, जमीन संबंधी मामलों और प्रभावशाली लोगों से जुड़े विवादों को सार्वजनिक करने वाले पत्रकारों एवं एक्टिविस्टों पर दबाव बनाने के लिए सोशल मीडिया को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इस अभियान में व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक कर बदनाम करने, धार्मिक रंग देने और माहौल को उग्र बनाने की कोशिश की जा रही है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि पुलिस जांच का विषय है। हालिया प्रकाशित रिपोर्टों में भी अकील अहमद अंसारी के समर्थन में ज्ञापन और शिकायतों का उल्लेख सामने आया है।

सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, पत्रकारिता की स्वतंत्रता का है-
शिकायत में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं सोशल मीडिया एक्टिविस्ट अकील अहमद अंसारी वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार जायसवाल, सोशल मीडिया इन्फ़्लूंशर आकांक्षा टोप्पो अन्य पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, अंसारी तथा अन्य लोगों ने सरगुजा क्षेत्र में जनहित से जुड़े अनेक मामलों को सोशल मीडिया और पत्रकारिता के माध्यम से उठाया।

इसी क्रम में शिकायत में आरोप लगाया गया है कि भाजपा कार्यकर्ता बताए गए धीरज सिंह और गौतम सिंह चौहान द्वारा अकील अहमद अंसारी के लगभग 17 वर्ष पुराने निजी जीवन से जुड़े मामले को सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि संबंधित निजी मामला 2015 में उच्च न्यायालय बिलासपुर में समाप्त हो चुका था, फिर भी उसे वर्तमान सार्वजनिक विवादों से जोड़कर प्रसारित किया जा रहा है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि निजी प्रकरण को धार्मिक रंग देकर ऐसी पोस्ट और सामग्री प्रसारित की गई, जिससे सामाजिक तनाव तथा अंसारी की व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होने की आशंका है। इन दावों की वास्तविकता, पोस्टों की प्रकृति और उनके पीछे की मंशा की भी जांच पुलिस द्वारा की जानी है।
क्या सोशल मीडिया ट्रोलिंग के पीछे कोई संगठित नेटवर्क है?
शिकायत में केवल सोशल मीडिया पोस्ट करने वालों की भूमिका तक मामला सीमित नहीं रखा गया है। शिकायतकर्ताओं ने पोस्टिंग टाइमलाइन, टैगिंग, कमेंट, शेयरिंग पैटर्न और संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट्स के डिजिटल रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की है।
यानी जांच का सवाल यह है कि—
* पोस्ट सबसे पहले किसने तैयार की?
* उसे किसने प्रकाशित किया?
* किस-किस अकाउंट से उसे शेयर किया गया?
* किन प्रभावशाली लोगों को टैग किया गया?
* किन लोगों ने उसे लाइक या कमेंट किया?
* क्या अलग-अलग अकाउंट्स से एक जैसा कंटेंट एक ही समय पर प्रसारित हुआ?
* क्या किसी संगठित नेटवर्क अथवा समन्वित अभियान के प्रमाण मिलते हैं?
इन सवालों का जवाब केवल सोशल मीडिया बहस से नहीं, बल्कि डिजिटल साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच से ही सामने आ सकता है।
राजनीतिक संरक्षण का भी लगाया गया आरोप-
शिकायत में भाजपा जिला अध्यक्ष सरगुजा भारत सिंह सिसोदिया और CAIT के प्रदेश उपाध्यक्ष रवीन्द्र तिवारी की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि संबंधित सोशल मीडिया पोस्टों पर इन लोगों की ओर से लाइक, कमेंट या टैग किए जाने की गतिविधियां सामने आईं, जिसे वे कथित अभियान से संभावित संबंध के रूप में देखते हैं।
हालांकि, किसी व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पोस्ट को लाइक या कमेंट करना अपने आप में किसी आपराधिक षड्यंत्र का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसलिए शिकायतकर्ताओं ने भी मूल डिजिटल डेटा, अकाउंट गतिविधियों और संपूर्ण घटनाक्रम की फॉरेंसिक जांच की मांग की है।
भारत सिंह सिसोदिया के संबंध में शिकायत में FIR क्रमांक 482/2025 का भी उल्लेख किया गया है। इस तरह के आरोपों और पुराने मामलों को वर्तमान घटनाक्रम से जोड़ने से पहले आधिकारिक पुलिस/अदालती रिकॉर्ड से उनका सत्यापन आवश्यक होगा।
अनुपम वस्त्रालय प्रकरण भी जांच के केंद्र में-
शिकायत में अनुपम वस्त्रालय प्रकरण को भी संदर्भ के रूप में रखा गया है। इस मामले में सर्व आदिवासी समाज के महिला प्रकोष्ठ ने पहले ही पीड़िता के कथित चरित्र-हनन और कथित जातिगत टिप्पणियों को लेकर शिकायत की थी। 17 सितंबर की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, समाज ने निष्पक्ष जांच, डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित करने और संबंधित आरोपों की जांच की मांग की थी।
इसके अलावा 21 सितंबर 2026 को सर्व आदिवासी समाज महिला प्रकोष्ठ की ओर से IG सरगुजा रेंज को शिकायत दिए जाने का भी प्रकाशित रिपोर्टों में उल्लेख है। यही कारण है कि वर्तमान शिकायतकर्ता पूरे घटनाक्रम को अलग-अलग घटनाओं के बजाय एक व्यापक पैटर्न के रूप में जांचने की मांग कर रहे हैं।
DGP से पांच बड़ी मांगें-
शिकायतकर्ताओं ने पुलिस महानिदेशक के समक्ष मुख्य रूप से निम्न मांगें रखी हैं—
1. तत्काल सुरक्षा-
अकील अहमद अंसारी और उनके परिवार को खतरे का आकलन कर आवश्यक पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
2. FIR और कानूनी कार्रवाई-
धीरज सिंह, गौतम सिंह चौहान तथा जांच में सामने आने वाले अन्य व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर, अपराध पाए जाने पर BNS एवं लागू साइबर कानूनों के तहत FIR दर्ज की जाए।
3. डिजिटल फॉरेंसिक जांच-
सोशल मीडिया अकाउंट्स की पोस्टिंग हिस्ट्री, मूल पोस्ट, शेयर, टैग, कमेंट, मेटाडेटा और संबंधित डिजिटल साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच कराई जाए।
4. आपत्तिजनक सामग्री पर वैधानिक कार्रवाई-
कानून के अनुरूप नफरत फैलाने, धमकी देने अथवा चरित्र-हनन करने वाली सामग्री के संबंध में सक्षम प्राधिकारी द्वारा आवश्यक कार्रवाई की जाए।
5. स्वतंत्र एवं उच्च स्तरीय जांच-
पूरे मामले की जांच CID अथवा किसी ऐसी स्वतंत्र जांच इकाई से कराने की मांग की गई है, जिस पर सभी पक्षों का विश्वास कायम हो सके।
पत्रकार संगठनों का सवाल—आलोचना का जवाब तथ्य से होगा या चरित्र-हनन से?
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी पत्रकार या एक्टिविस्ट की रिपोर्टिंग गलत है तो उसका जवाब दस्तावेज, तथ्य और कानून के माध्यम से क्यों नहीं दिया जाए?
पत्रकारों का कहना है कि किसी के पुराने निजी जीवन को सार्वजनिक करके उसे सामाजिक या धार्मिक विवाद में बदलना पत्रकारिता और लोकतांत्रिक संवाद के लिए गंभीर चुनौती हो सकती है। दूसरी ओर, जिन लोगों पर सोशल मीडिया अभियान चलाने के आरोप लगाए जा रहे हैं, उनकी स्वतंत्र प्रतिक्रिया और मूल डिजिटल साक्ष्यों की जांच भी निष्पक्ष जांच का आवश्यक हिस्सा होगी।
अब निगाह DGP कार्यालय की कार्रवाई पर-
मामला अब शिकायत से आगे बढ़कर पुलिस की जांच और प्रशासनिक कार्रवाई की कसौटी पर है। यदि सोशल मीडिया पोस्ट महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हैं तो तथ्य सामने आने चाहिए; और यदि जांच में संगठित धमकी, धार्मिक वैमनस्य, साइबर उत्पीड़न या किसी व्यक्ति को निशाना बनाने के प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई होना जरूरी होगा।
पत्रकारों की शिकायत का मूल सवाल साफ है—जनहित के सवाल उठाने की कीमत यदि चरित्र-हनन, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और सुरक्षा के खतरे के रूप में वसूली जाएगी, तो लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्र पत्रकारिता कैसे सुरक्षित रहेगी?
इसलिए अब गेंद पुलिस महानिदेशक के पाले में है—शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या यह मामला भी आरोप-प्रत्यारोप की भीड़ में दब जाएगा, इसका जवाब पुलिस कार्रवाई से ही सामने आएगा।
शिकायत करने वालों में मुख्य रूप से डी.पी. गोस्वामी (नया इंडिया), विद्यानंद ठाकुर (प्रधान संपादक, आज का दिन), शैलेश शर्मा, पारितोष शर्मा, दिव्या शर्मा गोस्वामी (प्रधान संपादक, डेमोक्रेसी प्रतिबिंब) सहित अन्य वरिष्ठ पत्रकारों ने ज्ञापन देकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।






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