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एथेनॉल नीति: ऊर्जा सुरक्षा के साथ कृषि, भूजल और उपभोक्ता हित का संतुलन जरूरी.......

Aug 11
3 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-

नई दिल्ली: केंद्र सरकार की एथेनॉल-ब्लेंडेड फ्यूल नीति को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर चिंताएं जताई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने की नीति का असर केवल वाहनों के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पानी, कृषि, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने सरकार से एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की कीमत कम करने की मांग करते हुए कहा कि इससे वाहनों का माइलेज प्रभावित हो रहा है और कुछ मामलों में इंजन के कलपुर्जों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है, जिसका आर्थिक बोझ उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है।


रघुनंदन ने कहा कि एथेनॉल उत्पादन में मक्के के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के कारण देश में मक्के की घरेलू मांग बढ़ी है। उनका दावा है कि भारत पहले मक्के का निर्यात करता था, लेकिन अब घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए आयात की स्थिति सामने आ रही है। उन्होंने इसे कृषि व्यवस्था के लिए गंभीर बदलाव बताते हुए कहा कि इससे पानी की खपत बढ़ सकती है और पारंपरिक कृषि पैटर्न प्रभावित हो सकता है। नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद ने एथेनॉल नीति के एक अन्य पहलू पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में चावल और चीनी के अतिरिक्त उत्पादन यानी सरप्लस स्टॉक के इस्तेमाल के लिए एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया है। सरकार की ओर से चावल और चीनी की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की गई, जिससे अतिरिक्त स्टॉक तैयार हुआ। ऐसे में उस स्टॉक को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने का रास्ता अपनाया गया।


रमेश चंद ने कहा कि देश में धान की खेती वाले कुछ क्षेत्रों को मक्के की खेती की ओर स्थानांतरित करने की जरूरत है। उनके मुताबिक, धान की खेती में बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है और इससे मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन भी होता है। हालांकि, खेती के पैटर्न में बदलाव को लागू करने से पहले क्षेत्रीय परिस्थितियों, किसानों की आय और खाद्य जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के पूर्व सचिव सिराज हुसैन ने भारत के एथेनॉल कार्यक्रम की तुलना ब्राजील से करने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की कृषि परिस्थितियां, आबादी और उपलब्ध संसाधनों में बड़ा अंतर है। ब्राजील बड़े पैमाने पर चीनी का उत्पादन और निर्यात करता है, जबकि भारत की खाद्य और कृषि जरूरतें अलग हैं।


हुसैन ने जलवायु परिवर्तन को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई अध्ययनों में भारत के कृषि उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों की ओर संकेत किया गया है। ऐसे में कृषि भूमि, पानी और खाद्य उत्पादन से जुड़े फैसलों को दीर्घकालिक दृष्टि से लेने की जरूरत है। परिचर्चा में E20 ईंधन को लेकर भी सवाल उठाए गए। डी रघुनंदन ने सरकार से E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति पर पुनर्विचार करने और E10 यानी 10 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण की ओर लौटने का सुझाव दिया। उनका कहना था कि मौजूदा व्यवस्था का लाभ और नुकसान अलग-अलग वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ रहा है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के कारण यदि वाहनों का माइलेज कम होता है तो उपभोक्ताओं के वास्तविक ईंधन खर्च पर असर पड़ता है। इसके अलावा पुराने या एथेनॉल मिश्रण के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं वाहनों के इंजन और संबंधित हिस्सों पर संभावित प्रभाव को लेकर भी उपभोक्ताओं में चिंता है। इसलिए एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की कीमत निर्धारित करते समय इन पहलुओं को ध्यान में रखने की मांग की गई। विशेषज्ञों के मुताबिक, एथेनॉल नीति को केवल पेट्रोल में मिश्रण बढ़ाने के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके प्रभाव का आकलन कृषि, भूजल, खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय, वाहन दक्षता और उपभोक्ता खर्च के आधार पर व्यापक रूप से किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा के साथ खाद्य और जल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है।


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