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छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस विशेष: 26 साल का हुआ हमारा छत्तीसगढ़—जश्न मनाएं, लेकिन आत्ममंथन की कीमत पर नहीं....

9 hours ago
11 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:- छत्तीसगढ़ 26 साल का हो गया... लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह जवान हुआ है या जवानी से पहले ही बूढ़ा हो गया मेरा छत्तीसगढ़? 1 नवंबर स्थापना दिवस है, इसलिए अपने आपको लिखने से नहीं रोक पाया। राज्य गठन की रजत जयंती के बाद अब आत्ममंथन का समय है... उत्सव के शोर में अपनी बदहाली की आवाज मत दबाइए! किसी परिवार का 26 साल का बेटा यदि नशे में डूब जाए, काम-धंधे से विमुख होकर निठल्ला बैठ जाए, माता-पिता की जिम्मेदारियां भूल जाए, अपने संस्कार और चरित्र खोने लगे और अंततः अपने पुरखों की अर्जित संपत्ति बेचकर जीवन चलाने लगे, तो उस परिवार के माता-पिता के मन पर क्या बीतेगी? क्या वे बेटे की उम्र के 26 वर्ष पूरे होने पर जश्न मनाएंगे या उसके भविष्य की चिंता में रातभर जागेंगे?


1 नवंबर को मेरा छत्तीसगढ़ भी 26 वर्ष का युवा हो जाएगा। ठीक उसी तरह जैसे किसी माता-पिता को अपने जवान बेटे से बड़ी उम्मीदें होती हैं, वैसे ही छत्तीसगढ़ की ढाई करोड़ जनता ने भी अपने नवगठित राज्य से उम्मीदों के असंख्य दीप जलाए थे। देश के महान जननेता, श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी संवेदनशीलता, दूरदृष्टि और दृढ़ संकल्प के साथ छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया था। उनका सपना केवल एक नया राज्य बनाना नहीं था। उनका सपना था कि छत्तीसगढ़ अपनी प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विरासत और मेहनतकश जनता के सामर्थ्य से देश के विकसित राज्यों की कतार में खड़ा हो। यहाँ के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, युवाओं को रोजगार मिले, किसानों को उनकी मेहनत का सम्मान और उचित मूल्य मिले, गरीबों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें, गांवों तक अच्छी सड़कें पहुंचें और छत्तीसगढ़ का वैभव उसकी जनता के जीवन में दिखाई दे। लेकिन आज 26 वर्ष बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो मन में उत्सव से अधिक प्रश्न उठते हैं। आत्मसंतोष से अधिक आत्मचिंतन की आवश्यकता महसूस होती है।


  1. राज्य तो उम्र के लिहाज से जवान हो गया, लेकिन क्या उसकी व्यवस्था भी जवान हुई? 

  2. क्या उसके सपने पूरे हुए? 

  3. या फिर हम अपने ही बनाए विकास के विज्ञापनों में वास्तविक छत्तीसगढ़ को कहीं खो बैठे हैं? 

  4. 26 साल में विकास की इमारतें तो खड़ी हुईं, लेकिन समाज की नींव कितनी मजबूत हुई?

  5. इन 26 वर्षों में सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, मंत्री बदले, अधिकारी बदले और राजनीतिक समीकरण बदले। बजट का आकार बढ़ा, योजनाओं की संख्या बढ़ी, विभागों का विस्तार हुआ, तथा जिलों और तहसीलों की संख्या बढ़ी। विकास के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए।

  6. ऊंची-ऊंची इमारतें बनीं, चौड़ी सड़कें बनीं, बड़े-बड़े भवन बने और संस्थान खुले। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास केवल सीमेंट, कंक्रीट, लोहे और उद्घाटन के पत्थरों का नाम है?

  7. जो सड़कें बनीं, क्या उनका रखरखाव हुआ?

  8. जो भवन बने, क्या उनका समुचित उपयोग हो रहा है? जो संस्थान खुले, क्या वे गुणवत्तापूर्ण सेवाएं दे रहे हैं?

  9. जो योजनाएं बनीं, क्या उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा?

  10. उद्घाटन के लिए फीते काटने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उद्घाटन के बाद उस संपत्ति की जिम्मेदारी लेने वाला कौन है?

आज हमारी सबसे बड़ी विडंबना यही है कि निर्माण को उपलब्धि और रखरखाव को अनावश्यक काम समझ लिया गया है। विकास की चमकदार तस्वीरों के पीछे जवाबदेही का अंधेरा लगातार गहराता जा रहा है।


शराब और नशे में डूबती युवा पीढ़ी: यह कैसी जवानी है?   

जिस छत्तीसगढ़ की पहचान कभी शांति, सरलता, सद्भाव और सामाजिक समरसता से होती थी, वहां आज शराबखोरी और सूखे नशे की बढ़ती समस्या गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। गांवों से शहरों तक नशे की पहुंच, युवाओं का इसकी गिरफ्त में आना, परिवारों का बिखरना और अपराध की घटनाओं को लेकर उठते सवाल किसी भी संवेदनशील समाज को विचलित करने के लिए पर्याप्त हैं। जिस उम्र में युवाओं के हाथों में रोजगार के अवसर, हुनर और भविष्य की योजनाएं होनी चाहिए, उस उम्र में नशे की समस्या से जूझती पीढ़ी दिखाई दे तो इसे केवल व्यक्तिगत कमजोरी कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। यह सामाजिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी का भी प्रश्न है। शराब से राजस्व कितना आया, इसकी गणना करने वाले बहुत हैं। लेकिन शराब और नशे के कारण कितने परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बिगड़ी, कितने युवाओं की संभावनाएं प्रभावित हुईं, इसका हिसाब कौन रखता है? सरकार की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि सरकारी खजाने में कितना राजस्व आया, बल्कि इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि समाज ने उसकी कीमत कितनी चुकाई।


शिक्षा: डिग्रीयों की दुकानें बढ़ीं, पर आज ज्ञान का स्तर कहां पहुंचा?

छत्तीसगढ़ में विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी, मेडिकल कॉलेज खुले, इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित हुए और निजी शिक्षण संस्थानों की कतार लग गई। यह निश्चित रूप से विस्तार है, लेकिन क्या यह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का प्रमाण भी है? क्या हमारे विश्वविद्यालय शोध, नवाचार और अकादमिक उत्कृष्टता के राष्ट्रीय मानक स्थापित कर रहे हैं? क्या हमारे मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थान देश के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों से प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने शिक्षा को ज्ञान और व्यक्तित्व निर्माण के बजाय डिग्री वितरण का कारोबार बना दिया है? कॉलेजों की इमारतें खड़ी कर देना आसान है, लेकिन प्रतिभाशाली शिक्षक, शोध का वातावरण, प्रयोगशालाएं और शैक्षणिक अनुशासन तैयार करना कठिन है। आज आवश्यकता संस्थानों की संख्या गिनने की नहीं, उनकी गुणवत्ता का मूल्यांकन करने की है।


स्वास्थ्य व्यवस्था: बीमारी से बड़ी चिंता इलाज के खर्च की हो गई!   

एक समय था जब गरीब आदमी बीमारी से लड़ता था, आज उसे बीमारी के साथ-साथ इलाज के खर्च से भी लड़ना पड़ता है। अस्पतालों में सुविधाओं की कमी, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, जांच और दवाइयों की व्यवस्था तथा निजी अस्पतालों में इलाज के खर्च को लेकर आम नागरिकों की शिकायतें लगातार सामने आती हैं। सरकारी योजनाओं और स्वास्थ्य बजट के दावों के बावजूद यदि आम आदमी को बेहतर इलाज के लिए अपनी जमीन, जेवर और जमा पूंजी बेचनी पड़े, तो हमें अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता पर पुनर्विचार करना ही होगा। अस्पतालों की संख्या बढ़ाना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अस्पताल में समय पर डॉक्टर, दवा, जांच और संवेदनशील व्यवहार उपलब्ध होना वास्तविक उपलब्धि है।


किसान का क्या हाल है: धरती का बेटा अपनी ही जमीन पर बेबस क्यों?   

छत्तीसगढ़ की आत्मा गांवों में बसती है और गांवों की आत्मा किसान है। जिस राज्य की पहचान धान के कटोरे के रूप में रही हो, वहां किसान की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए थी। लेकिन आज खेती की लागत, खाद, बीज, दवाइयों, मजदूरी और मौसम की अनिश्चितता से किसान जूझ रहा है। कभी अतिवृष्टि, कभी सूखा, कभी फसल की बीमारी और कभी बाजार की मार उसकी कमर तोड़ देती है। विडंबना देखिए, जिस किसान ने पीढ़ियों तक अपनी जमीन बचाकर रखी, आज उसी किसान के परिवार में जमीन बेचने की विवशता बढ़ती दिखाई देती है। किसान अपनी जमीन बेचता है तो केवल एक भूखंड नहीं बिकता, उसके साथ उसकी पीढ़ियों की स्मृतियां, उसकी पहचान, उसका स्वाभिमान और आने वाली पीढ़ियों की आजीविका का आधार भी कमजोर होता है। जिस दिन छत्तीसगढ़ का किसान अपनी जमीन से बेदखल होकर मजदूर बनने को विवश होगा, उस दिन हम केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा का संकट देख रहे होंगे।


क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बेच रहे हैं?   

यह विषय सबसे अधिक गंभीरता से विचार करने योग्य है। आज सरकारी जमीनों के संरक्षण, आवंटन, उपयोग और कथित अनियमितताओं को लेकर अनेक सवाल उठ रहे हैं। सार्वजनिक उपयोग की जमीनों का भविष्य क्या है? कितनी जमीन स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, खेल मैदान, आंगनबाड़ी, उद्यान और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए सुरक्षित रखी जा रही है? किसी भी सरकार के पास जमीन जनता की अमानत होती है। वह किसी सरकार, मंत्री, अधिकारी या किसी राजनेता, समाज या राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं होती। आज यदि सरकारी जमीनों का उपयोग पारदर्शिता और दूरदृष्टि के बिना किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। कल्पना कीजिए, दस वर्ष बाद किसी नई बस्ती में स्कूल खोलना हो, अस्पताल बनाना हो, कॉलेज स्थापित करना हो, बच्चों के लिए खेल मैदान बनाना हो या सार्वजनिक उद्यान विकसित करना हो, लेकिन हमारे पास जमीन ही न बचे, तब क्या होगा? तब सरकारें योजनाओं की घोषणा तो करेंगी, लेकिन जमीन तलाशने के लिए दर-दर भटकेंगी। जमीन केवल आज की सरकार की जरूरत नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों का अधिकार भी है।


भाषा और संस्कृति: छत्तीसगढ़ बचा है या केवल नाम बचा है?   

सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि जिस छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी भाषा, लोकसंस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य, परंपराओं, खानपान और सहज जीवनशैली से थी, वही पहचान धीरे-धीरे कमजोर होती दिखाई दे रही है। छत्तीसगढ़ी भाषा को वह सम्मान और संस्थागत स्थान आज भी नहीं मिल पाया, जिसकी वह वास्तविक अधिकारी है। दूसरी ओर, आधुनिकता के नाम पर हमारी नई पीढ़ी अपनी लोकपरंपराओं, संस्कारों और सांस्कृतिक विरासत से दूर होती जा रही है। देश के अनेक राज्यों में मातृभाषा-बोली आधारित प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। नई शिक्षा नीति भी मातृभाषा व बोली में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा, हल्बी, गोड़ी सहित यहां की मूल बोलियों को शिक्षा, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में वह स्थान दिलाने के लिए जितनी इच्छाशक्ति दिखाई जानी चाहिए थी, वह कहां है? क्या छत्तीसगढ़ी केवल चुनावी मंचों पर भाषण देने, लोकगीत गाने और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तालियां बटोरने के लिए रह जाएगी? याद रखिए, भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की आत्मा और उसकी ऐतिहासिक स्मृति होती है। जिस दिन कोई समाज अपनी भाषा में सोचने, बोलने और अगली पीढ़ी को संस्कार देने में संकोच करने लगे, उस दिन उसकी सांस्कृतिक पराजय शुरू हो जाती है।


आज जनता मालिक है या व्यवस्था की मोहताज?

यह प्रश्न हर व्यक्ति की जुबान पर है, पर वह इसे खुलकर व्यक्त नहीं कर पा रहा है। राज्य गठन के समय प्रशासनिक इकाइयां कम थीं। जिले कम थे, तहसीलें कम थीं, सरकारी कार्यालय कम थे। लेकिन आम आदमी को अपनी बात कहने, अधिकारी तक पहुंचने और छोटे-बड़े काम कराने के लिए इतनी जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती थी, जैसी आज अनेक मामलों में दिखाई देती है। आज व्यवस्था का विस्तार हुआ है, लेकिन क्या संवेदनशीलता का भी विस्तार हुआ है? क्या आम नागरिक सरकारी दफ्तरों में सम्मान के साथ अपनी बात रख सकता है? क्या उसे अपने छोटे-छोटे कामों के लिए महीनों चक्कर नहीं लगाने पड़ते? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ बिना अनावश्यक परेशानी के मिल रहा है? प्रशासन का उद्देश्य जनता की सेवा करना है, जनता को अपने सामने झुकाना नहीं। जब नागरिक अपनी ही सरकार के कार्यालय में असहाय महसूस करने लगे, तब प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक हो जाती है। लोकतंत्र में अधिकारी जनता के सेवक हैं, जनता उनके अधीनस्थ नहीं।


जंगल उजड़ रहे हैं, हरियाली के आंकड़े बढ़ रहे हैं!

छत्तीसगढ़ की पहचान उसके जंगलों, नदियों, पहाड़ों और प्राकृतिक संपदा से रही है। हर साल वृक्षारोपण के बड़े-बड़े अभियान चलाए जाते हैं। पौधरोपण के फोटो आते हैं, आंकड़े जारी होते हैं और समारोह आयोजित होते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि लगाए गए पौधों में से कितने जीवित हैं? कितने पेड़ बन पाए? कितने जंगल बचाए गए? पौधा लगाना एक दिन का कार्यक्रम है, उसे पेड़ बनाना वर्षों की जिम्मेदारी है। हमारे जंगल केवल लकड़ी और खनिज के स्रोत नहीं हैं। वे आदिवासी समाज की आजीविका, जैव विविधता, जल स्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन के आधार हैं। यदि विकास की कीमत जंगलों के विनाश और प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित दोहन से चुकाई जा रही है, तो यह विकास नहीं, भविष्य के साथ समझौता है।


कभी अभाव थे, लेकिन संतोष था; आज साधन हैं, फिर भी सवाल हैं!   

एक बार 26 वर्ष पीछे लौटकर देखिए। उस समय हमारे पास संसाधन कम थे, लेकिन जो कुछ था, उसकी उपयोगिता और स्थायित्व अधिक महसूस होता था। सड़कें कम थीं, लेकिन कई सड़कें दशकों तक चलती थीं। पुलिस बल और थाने कम थे, लेकिन सामाजिक जीवन में शांति और सुरक्षा की भावना थी। प्रशासनिक कार्यालय कम थे, लेकिन आम आदमी के भीतर व्यवस्था को लेकर इतना भय और असहायता नहीं थी। शराब की दुकानें और नशे का फैलाव आज की तरह सार्वजनिक चिंता का विषय नहीं थे। गांवों में किसान सीमित साधनों के बावजूद अपनी जमीन और खेती से जुड़ा रहता था। युवा बेरोजगार जरूर होते थे, लेकिन बहुत से युवा अपने पैतृक व्यवसाय, खेती-किसानी, छोटे-मोटे रोजगार और पारिवारिक कामों में हाथ बंटाते थे। उनके सामने संघर्ष था, लेकिन जीवन से जुड़ाव भी था। आज हमारे पास मोबाइल है, इंटरनेट है, बड़ी-बड़ी इमारतें हैं और आधुनिक साधन हैं, लेकिन क्या हमने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी, पारिवारिक संस्कार और सामुदायिक जीवन की मजबूती भी उतनी ही बढ़ाई है? यह अतीत का अंधा महिमामंडन नहीं, बल्कि वर्तमान का आईना है।


आखिर इन 26 वर्षों का हिसाब कौन देगा?   

छत्तीसगढ़ में इन 26 वर्षों के दौरान अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें रहीं। हर सरकार ने अपनी उपलब्धियां गिनाईं, अपने विकास मॉडल का प्रचार किया और अपने कार्यकाल को ऐतिहासिक बताया। लेकिन जनता को केवल उपलब्धियों की पुस्तिका नहीं चाहिए, उसे वास्तविकता का हिसाब चाहिए।

हमें जानना चाहिए कि इन 26 वर्षों में:

  • युवाओं को कितने स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार मिले?

  • शिक्षा की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ?

  • स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी सुलभ और किफायती हुईं?

  • किसानों की वास्तविक आय और आर्थिक सुरक्षा कितनी बढ़ी?

  • कितने जंगल बचे और वृक्षारोपण के कितने पौधे पेड़ बने?

  • कितनी सार्वजनिक जमीन भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखी गई?

  • छत्तीसगढ़ी भाषा को शिक्षा और प्रशासन में कितना सम्मान मिला?

  • अपराध, नशे और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए क्या ठोस परिणाम आए?

  • सार्वजनिक धन से बने भवनों और सड़कों का रखरखाव कितना हुआ?

  • प्रशासनिक जवाबदेही कितनी मजबूत हुई?

ये सवाल किसी एक राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं हैं। ये सवाल उन सभी लोगों से हैं, जिन्हें इन 26 वर्षों में छत्तीसगढ़ की सत्ता, संसाधनों और व्यवस्था को संचालित करने का अवसर मिला।


अटल जी के सपनों का छत्तीसगढ़ कहां है?   

अटल बिहारी वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ को केवल भौगोलिक पहचान नहीं दी थी, उन्होंने यहां की जनता को एक नई आशा दी थी। उन्होंने सोचा होगा कि इस धरती का बेटा अपनी प्रतिभा और परिश्रम से देश-दुनिया में पहचान बनाएगा। यहां का किसान समृद्ध होगा, आदिवासी समाज अपनी अस्मिता के साथ आगे बढ़ेगा, युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में भटकने को विवश नहीं होंगे और छत्तीसगढ़ अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ आधुनिक विकास की मिसाल बनेगा। आज 26 वर्ष बाद हमें अपने आप से पूछना होगा कि हम उस संकल्प के कितने निकट पहुंचे हैं? क्या हमने अटल जी के सपनों को साकार करने के लिए काम किया या उनके नाम पर केवल समारोह और स्मृति कार्यक्रम आयोजित करके अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली? अटल जी ने राज्य बनाया था, लेकिन राज्य को महान बनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी थी। राज्य का गठन एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, लेकिन राज्य का निर्माण आज भी अधूरा है।


निष्कर्ष

अंत में... आप सबको छत्तीसगढ़ की जन्मदिन की बधाई दूं या भविष्य की चिंता करूं? मेरा छत्तीसगढ़ कल 26 साल का हो जाएगा। उम्र के इस पड़ाव पर उसे आत्मविश्वास से भरा, ऊर्जावान, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर होना चाहिए था। लेकिन आज उसके सामने नशे की चुनौती है, बेरोजगारी का संकट है, किसानों की पीड़ा है, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता का सवाल है, संस्कृति और भाषा के अस्तित्व की चिंता है, जंगलों और जमीनों के संरक्षण की चुनौती है और प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर प्रश्न है। मैं यह नहीं कहता कि इन 26 वर्षों में कुछ हुआ ही नहीं। बहुत कुछ हुआ है, बहुत कुछ बदला भी है। लेकिन विकास के कुछ द्वीप बन जाने से पूरे प्रदेश की तस्वीर सुंदर नहीं हो जाती। जिस तरह परिवार का कोई जिम्मेदार सदस्य अपने भटके हुए बेटे को केवल जन्मदिन की बधाई देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकता, उसी तरह हम भी छत्तीसगढ़ के 26 वर्ष पूरे होने पर केवल उत्सव मनाकर अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकते।


आज आवश्यकता है कि सत्ता में बैठे लोग आत्ममंथन करें, विपक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाए, प्रशासन जवाबदेह बने और समाज भी अपनी भूमिका पहचाने। हमें तय करना होगा कि अगले दस वर्षों में हम कैसा छत्तीसगढ़ चाहते हैं। क्या हम ऐसा छत्तीसगढ़ चाहते हैं जहां युवा नशे से नहीं, नवाचार से पहचाना जाए? जहां किसान जमीन बेचने को नहीं, खेती को समृद्ध बनाने को प्रेरित हो? जहां छत्तीसगढ़ी भाषा को अपने ही घर में सम्मान मिले? जहां सरकारी जमीन जनता के भविष्य के लिए सुरक्षित हो? जहां शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवसाय नहीं, सेवा के विश्वसनीय माध्यम बनें? जहां विकास का अर्थ केवल इमारतें नहीं, बल्कि इंसान का बेहतर जीवन हो? छत्तीसगढ़ किसी व्यक्ति, सरकार, दल या संस्था की जागीर नहीं है। यह हमारी पीढ़ियों की विरासत है और आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। इसे बचाना, संवारना और समृद्ध बनाना हम सबकी जिम्मेदारी है।


मेरे ये शब्द कड़वे जरूर हैं, लेकिन इनका उद्देश्य किसी का अपमान नहीं, बल्कि उस छत्तीसगढ़ के प्रति अपनी पीड़ा और चिंता व्यक्त करना है, जिसे हमने बड़े सपनों के साथ बनते देखा था। इसलिए इस बार जब आप छत्तीसगढ़ का जन्मदिन मनाएं, तो एक बार खुद से जरूर पूछिएगा—इन 26 वर्षों में हमने क्या पाया, क्या खोया और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम क्या छोड़कर जा रहे हैं? क्योंकि इतिहास केवल यह नहीं लिखेगा कि छत्तीसगढ़ का गठन कब हुआ था, इतिहास यह भी पूछेगा कि जिन लोगों को छत्तीसगढ़ को संवारने की जिम्मेदारी मिली थी, उन्होंने छत्तीसगढ़ के साथ क्या किया? अटल जी ने छत्तीसगढ़ बनाया था, अब छत्तीसगढ़ को बचाने और बनाने की जिम्मेदारी हमारी है। भरे मन से अपने छत्तीसगढ़ राज्य के 26वें स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई...!

संवाददाता: राकेश साहू, शालिनी न्यूज़ एजेंसी, जांजगीर-चांपा #ChhattisgarhAt26 #ChhattisgarhFoundationDay #CGNews #AtalBihariVajpayee #ChhattisgarhCulture #RaipurNews #CGPolitics #JanJgeerChampa #BreakingADNNews

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