भिलाई में नशीली गोलियों के अवैध व्यापार का मामला: अदालत ने 11 गंभीर कमियों के चलते आरोपी को किया बरी...

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-
भिलाई। छत्तीसगढ़ के भिलाई शहर में न्याय व्यवस्था की एक बड़ी चूक और पुलिसिया कार्रवाई की कमजोरियों का फायदा उठाकर एक बड़ा मामला अदालत में ढह गया। सेक्टर-6 इलाके में प्रतिबंधित नशीली गोलियों की बरामदगी से जुड़े एक संगीन मामले में विशेष न्यायाधीश सुनीता टोप्पो की अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्य आरोपी बी. पवन कल्याण को तमाम आरोपों से बरी कर दिया है। इस फैसले के पीछे पुलिस जांच और जब्ती प्रक्रिया में पाई गईं कुल 11 बड़ी खामियां मुख्य वजह बनीं, जिसके चलते अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ। इस केस में आरोपी पक्ष की ओर से पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश दांडेकर ने की।
क्या था पूरा घटनाक्रम ?
यह पूरा मामला 15 दिसंबर 2024 का है, जब पुलिस को मुखबिर के जरिए यह सूचना मिली थी कि सेक्टर-6 स्थित आयकर भवन के पास अवैध रूप से नशीली दवाओं की खरीद-फरोख्त की जा रही है। मौके पर दबिश देकर पुलिस ने बी. पवन कल्याण को दबोचने का दावा किया था और उसके कब्जे से अल्प्राजोलम (Alprazolam) की 1280 गोलियां बरामद करने की बात कहते हुए थाना भिलाई नगर में अपराध क्रमांक 510/2024 दर्ज किया था।
पुलिस के दावों की हवा क्यों निकली ?
अदालत में चली लंबी सुनवाई के दौरान पुलिस के अपने ही दस्तावेज और बयान एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए, जिससे जांच की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े हो गए:
वजन में भारी झोल: पुलिस ने जब्ती के वक्त 1280 गोलियों का कुल वजन 153.06 ग्राम दर्ज किया था। वहीं, बाद में जब न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने इन्हीं गोलियों की गिनती और तौल हुई, तो उनका वजन बढ़कर 294.98 ग्राम निकला। दोनों ही आंकड़ों में सीधे तौर पर 141.92 ग्राम का बड़ा अंतर था, जिसका कोई ठोस जवाब अभियोजन पक्ष अदालत को नहीं दे पाया।
दस्तावेजों में अपराध क्रमांक की पहेली: सबसे बड़ा तकनीकी विरोधाभास यह सामने आया कि एफआईआर (FIR) दर्ज होने का समय 15 दिसंबर को शाम 5:21 बजे का था, जबकि मौके पर तैयार किए गए तौल पंचनामा और जब्ती पत्रक जैसे दस्तावेजों पर पहले से ही अपराध क्रमांक 510/2024 लिखा हुआ था। अदालत में यह सवाल अहम बन गया कि एफआईआर दर्ज होने से पहले ही कागजातों पर केस नंबर कैसे दर्ज हो गया।
गवाहों और कस्टडी पर सवाल: मामले के स्वतंत्र गवाह राधेश्याम और प्रदीप कुमार ठाकुर ने भी पुलिस की कार्रवाई का पूरी तरह समर्थन नहीं किया। इसके अलावा, गोलियों का वजन करने वाले विशेषज्ञ और मालखाने के मुंशी को गवाह के तौर पर अदालत में पेश ही नहीं किया गया, जिससे जब्त सामग्री की सुरक्षा और सीक्रेसी पर गंभीर संदेह पैदा हुआ।
सैंपलिंग में देरी और अनियमिताएं: पुलिस ने सभी पट्टियों से नमूने (सैंपल) नहीं उठाए, और सैंपल लेने की प्रक्रिया में भी चार दिन का लंबा अंतराल देखा गया। साथ ही, मुखबिर से मिली सूचना को वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाने के नियमों के पालन में भी बयानों और फाइलों में भारी विरोधाभास मिला।
इन सभी तकनीकी खामियों, दस्तावेजों की अंतर्विरोध और प्रक्रियागत भूलों को आधार बनाते हुए अदालत ने आरोपी को संदेह का पूरा लाभ दिया और उसे बरी कर दिया। यह फैसला एक बार फिर यह साबित करता है कि आपराधिक मामलों में पुलिस की बारीक से बारीक लापरवाही भी किस तरह न्याय प्रक्रिया का रुख बदल सकती है।






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