खैरागढ़ में पत्रकार किशोर सोनी के साथ पुलिसिया मारपीट पर भड़का आक्रोश....

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:- खैरागढ़ में राज्योत्सव (राजा फतेह सिंह मैदान) की कवरेज कर रहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार किशोर सोनी के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा कथित मारपीट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद आक्रोशित पत्रकारों ने थाने के सामने धरना प्रदर्शन किया। इस मामले में संज्ञान लेते हुए 8वीं बटालियन (राजनांदगांव) के आरक्षक रजनीकांत उपाध्याय को 2 नवंबर 2026 को निलंबित कर दिया गया है। वहीं, पत्रकारों ने घटना की निष्पक्ष जांच, इसमें शामिल अन्य पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई और पीड़ित पत्रकार को सुरक्षा देने की मांग की है। इस घटना के बाद राज्य शासन और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल यह उठता है कि इस तरह की घटनाओं में केवल निलंबन (सस्पेंशन) या लाइन अटैच जैसी कार्रवाई ही क्यों की जाती है? क्या न्यायपालिका के माध्यम से ऐसे आरोपियों पर सीधे कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए?
अक्सर यह देखा गया है कि पत्रकारों पर हमला करने वाले कर्मियों को प्रशासनिक स्तर पर संरक्षण मिल जाता है, जबकि यदि ड्यूटी के दौरान किसी पत्रकार की असामयिक मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को न तो पर्याप्त सुरक्षा मिलती है और न ही प्रशासन या राज्य शासन की ओर से उचित मुआवजा व सहायता दी जाती है। जबकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकार अपनी जान को जोखिम में डालकर बड़े से बड़े मामलों और खबरों को जनता तक पहुँचाते हैं। इसके बावजूद, जब पत्रकारों द्वारा शासन-प्रशासन की नीतियों और कार्यप्रणाली को उजागर किया जाता है, तो कई बार अधिकारी, कर्मचारी और राजनेता अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर पत्रकारों को दबाने या कुचलने का प्रयास करते हैं। इस तरह के मामले केवल किसी एक पत्रकार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट, ऑनलाइन और ऑफलाइन सभी माध्यमों के पत्रकारों को इस तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। जब पत्रकारों पर हमले के बाद थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाती है, तो पुलिस अक्सर मामूली धाराएं लगा देती है, जिससे आरोपी को आसानी से जमानत मिल जाती है।
कई मामलों में गंभीर धाराओं (जैसे हाफ मर्डर या जानलेवा हमला) को भी मामूली धाराओं में बदल दिया जाता है, जबकि कानूनन मारपीट और खून खराबे की स्थिति में सख्त प्रकरण दर्ज होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस प्रशासन अपने ही लोगों को बचाने में लगा रहता है और पैसों के लेन-देन या दबाव के चलते धाराओं में फेरबदल कर दिया जाता है। खैरागढ़ की इस घटना में भी प्रशासन ने अपने कर्मचारी को बचाने के लिए केवल औपचारिकता पूरी की है, जिससे पत्रकारों में भारी असंतोष व्याप्त है।
संवाददाता: राकेश कुमार साहू, शालिनी न्यूज़ एजेंसी, जांजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़)।






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