परंपरा का अद्भुत संगम: इंसानों की नहीं देवी-देवताओं की सजी अदालत....
- ANIS LALA DANI

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ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-
नगरी/सिहावा: धमतरी जिले के नगरी-सिहावा क्षेत्र के बोरई जंगल स्थित कुर्सीघाट में शनिवार को आस्था और आदिवासी परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिला। यहां इंसानों की नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की ‘पेशी’ वाली देव अदालत सजी। पहाड़ के ऊपर आयोजित इस पारंपरिक देव दरबार में सिहावा, बस्तर और ओडिशा क्षेत्र से देवी-देवताओं के प्रतीक पारंपरिक विधि-विधान के साथ पहुंचे।
ढोल-नगाड़ों के साथ पहुंचीं देव पालकियां:
आंगा देव, डांग, डोली, पालकी और अन्य देव प्रतीकों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुर्सीघाट पहुंचे। ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा और श्रद्धालुओं की मौजूदगी से जंगल का पूरा इलाका धार्मिक उत्सव में बदल गया। देखते ही देखते कुर्सीघाट में मेले जैसा माहौल नजर आने लगा। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां 16 परगना सिहावा, 20 कोस ओडिशा और 7 पाली बस्तर के देवी-देवताओं का मिलन होता है। यही वजह है कि यह आयोजन किसी एक गांव तक सीमित न होकर कई क्षेत्रों की साझा देव परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

देवी-देवताओं की होती है ‘पेशी’:
लोकमान्यता के मुताबिक यदि किसी देवी-देवता से कोई भूल या परंपरा से जुड़ा विवाद माना जाता है, तो उसे इस देव दरबार में लाया जाता है। संबंधित देवता के प्रतीक को परंपरा के अनुसार पेश किया जाता है और फिर देव व्यवस्था के मुताबिक निर्णय की प्रक्रिया होती है। स्थानीय लोगों के अनुसार बंगाराव माई को न्याय की देवी माना जाता है। कुछ मामलों में दोषी माने गए देवता को प्रतीकात्मक रूप से हिरासत में रखने की भी परंपरा बताई जाती है। यही अनोखी मान्यता कुर्सीघाट के देव दरबार को दूसरे धार्मिक आयोजनों से अलग पहचान देती है।
देव परंपरा में अनुमति का विशेष महत्व:
स्थानीय लोकविश्वास के अनुसार सिहावा क्षेत्र का संबंध बस्तर राजपरिवार की देव परंपराओं से भी रहा है। आदिवासी समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से निभाई जा रही है। मान्यता है कि बंगाराव माई की अनुमति के बिना देव सीमा में कोई बड़ा धार्मिक कार्य नहीं किया जाता। इस तरह यहां धार्मिक आस्था के साथ-साथ देव व्यवस्था और सामुदायिक परंपराओं का भी विशेष महत्व है।
बस्तर और ओडिशा तक जुड़ी है परंपरा:
कुर्सीघाट का यह देव दरबार आदिवासी समाज की उस सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाता है, जहां लोकविश्वास, परंपरा और सामुदायिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। देवी-देवताओं की पेशी, न्याय की मान्यता और अलग-अलग क्षेत्रों से आए देव प्रतीकों का मिलन इस आयोजन को खास बनाता है। आस्था और परंपरा से जुड़ा यह आयोजन यह भी दिखाता है कि छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोक संस्कृति आज भी गांवों और जंगलों में जीवंत रूप से निभाई जा रही है।



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