छत्तीसगढ़ में शिक्षकों का असंतोष गहराया, विभागीय TET पर आदेश अटका तो आंदोलन की चेतावनी....

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-
रायपुर। छत्तीसगढ़ के शिक्षकों का सब्र अब जवाब देने लगा है। शिक्षा विभाग की तरफ से विभागीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर अब तक कोई आधिकारिक निर्देश सामने नहीं आया है, जिससे राज्यभर के शिक्षकों में भारी रोष है। 'शिक्षक साझा मंच' ने दो टूक कहा है कि अगर जल्द ही लिखित आदेश जारी नहीं हुआ, तो बड़े स्तर पर आंदोलन का बिगुल फूंका जाएगा।
बैठकों और आश्वासनों के बावजूद स्थिति सिफर -
विभागीय टीईटी के मसले पर शासन स्तर पर कई दौर की चर्चाएं हो चुकी हैं। शिक्षक साझा मंच के प्रांतीय संयोजक रविन्द्र राठौर के मुताबिक, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के साथ दो बार और उच्च अधिकारियों के साथ तीन बार मैराथन बैठकें हो चुकी हैं। इन वार्ताओं में हर साल तीन बार विभागीय टीईटी करवाने का फॉर्मूला भी टेबल पर आया था और सकारात्मक संकेत दिए गए थे। इसके बावजूद ज़मीनी स्तर पर कोई अमल न होने से शिक्षकों में असमंजस और निराशा का माहौल है।
2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को मिले राहत -
मंच से जुड़े प्रदीप पाण्डेय ने शिक्षकों के हक की बात रखते हुए स्पष्ट किया कि साल 2010 से पहले सेवा में आए तमाम शिक्षकों को इस पात्रता परीक्षा से पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि पुराने नियमों के तहत नियुक्त कर्मियों के भविष्य और सेवा सुरक्षा को लेकर तस्वीर बिल्कुल साफ होनी चाहिए, ताकि बेवजह का मानसिक तनाव न झेलना पड़े।
साझा मंच की दो टूक: अब जुबानी वादों से काम नहीं चलेगा -
संचालक विकास राजपूत ने साफ कर दिया है कि महज़ मौखिक आश्वासनों के सहारे अब गाड़ी नहीं चलेगी। विभाग को बिना किसी देरी के परीक्षा की तारीखों, आवेदन के तौर-तरीकों और पूरी रूपरेखा का सार्वजनिक ऐलान करना होगा। जाकेश साहू और लैलून भारद्वाज ने भी हुंकार भरी है कि इस मुद्दे पर सूबे के तमाम शिक्षक संगठनों को एक ही छत के नीचे लाकर आर-पार की रणनीति बनाई जाएगी।
संगठन के प्रमुख चेहरों—रविन्द्र राठौर, विकास राजपूत, प्रदीप पाण्डेय, लैलून भारद्वाज, जाकेश साहू और चेतन बघेल ने सरकार से मांग की है कि इस गंभीर मसले को और न खींचा जाए। गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत ने मई 2026 में टीईटी क्लीयर करने की डेडलाइन 31 अगस्त 2028 तक बढ़ाई थी और समय-समय पर परीक्षाएं कराने की ताकीद की थी, लेकिन राज्य में सुस्त पड़ी प्रशासनिक चाल शिक्षकों का धैर्य तोड़ रही है।






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