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जामनगर रिफाइनरी से EU को छह खेपें, रूसी तेल प्रतिबंध पर बढ़े सवाल...

59 minutes ago
4 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-

नई दिल्ली :- रूस से कच्चा तेल खरीदने और उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस करने के बाद भारत उससे तैयार पेट्रोलियम उत्पाद पश्चिमी देशों को निर्यात कर रहा है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 में भारत, तुर्किये और ब्रुनेई की उन रिफाइनरियों से यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को करीब 1 अरब यूरो यानी 1.2 अरब डॉलर के तेल उत्पाद भेजे गए, जो रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल करती हैं। यह निर्यात अगस्त के मुकाबले 43 फीसदी अधिक है।


रिपोर्ट के सामने आने के बाद रूस से तेल खरीदने, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक ऊर्जा व्यापार को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। खास बात यह है कि यूरोपीय संघ ने रूसी कच्चे तेल से तैयार तेल उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। इसके बावजूद सितंबर में भारत की जामनगर रिफाइनरी से तैयार उत्पादों की छह खेप यूरोपीय संघ के बंदरगाहों पर पहुंचीं। इससे प्रतिबंधों को लागू करने और तेल की आपूर्ति की निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।


अगस्त 2026 में इन रिफाइनरियों से प्रतिबंध लगाने वाले देशों को भेजे गए तेल उत्पादों का मूल्य करीब 51 करोड़ यूरो था। सितंबर में यह बढ़कर लगभग दोगुना हो गया। CREA के अनुमान के अनुसार, सितंबर में निर्यात किए गए उत्पादों में करीब 29.5 करोड़ यूरो मूल्य के उत्पाद ऐसे थे, जिन्हें रूसी कच्चे तेल से तैयार किया गया था। इसलिए कुल 1 अरब यूरो के निर्यात को पूरी तरह रूसी तेल से बना उत्पाद मानना सही नहीं होगा। इस व्यापार में गुजरात स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी की अहम भूमिका सामने आई है।


CREA की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में यूरोपीय संघ के बंदरगाहों पर पहुंची तेल उत्पादों की सात खेपों में से छह भारत की जामनगर रिफाइनरी से रवाना हुई थीं। सातवीं खेप तुर्किये की तुप्रास इजमित रिफाइनरी से आई थी। जामनगर रिफाइनरी दुनिया की प्रमुख तेल शोधन सुविधाओं में शामिल है। यहां कच्चे तेल को प्रोसेस करके डीजल, पेट्रोल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद तैयार किए जाते हैं। अलग-अलग स्रोतों से आने वाले कच्चे तेल को प्रोसेस करने के बाद तैयार उत्पादों का निर्यात भारत के ऊर्जा व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


CREA की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई से सितंबर 2026 के बीच जामनगर रिफाइनरी के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 32 फीसदी थी। सितंबर में यूरोपीय संघ की ओर भेजी गई एक बड़ी खेप में लगभग 1.04 लाख टन गैस ऑयल शामिल था, जो महीने के अंत तक रॉटरडैम के रास्ते में था। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को सीमित करने के लिए कई प्रतिबंध लगाए। यूरोपीय संघ ने 21 जनवरी 2026 से रूसी कच्चे तेल से तैयार कुछ पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लागू किया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रूस से खरीदे गए कच्चे तेल को किसी तीसरे देश में रिफाइन करके यूरोपीय बाजार तक पहुंचाने के जरिए प्रतिबंधों को निष्प्रभावी न किया जा सके।


हालांकि, अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में कच्चे तेल और उससे तैयार उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला जटिल होती है। रिफाइनरियां अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीद सकती हैं और एक ही संयंत्र में विभिन्न स्रोतों के तेल को प्रोसेस किया जा सकता है। ऐसे में अंतिम उत्पाद की उत्पत्ति, उसके उत्पादन में इस्तेमाल हुए कच्चे तेल और आपूर्ति के दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। CREA ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल करने वाली रिफाइनरियों से आने वाली खेपों की निगरानी और जांच जरूरी है। रिपोर्ट में यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से ऐसी खेपों की पड़ताल करने की जरूरत पर जोर दिया गया है, ताकि प्रतिबंधों का प्रभावी पालन सुनिश्चित हो सके।


हालांकि, किसी खेप का ऐसे रिफाइनरी से आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसका आयात प्रतिबंधों का उल्लंघन था; इसके लिए संबंधित नियमों और उत्पाद की उत्पत्ति की जांच जरूरी है। दिलचस्प बात यह है कि पश्चिमी देशों को तैयार उत्पादों का निर्यात बढ़ने के दौरान भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में कमी भी दर्ज की। CREA के मुताबिक, सितंबर 2026 में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात अगस्त के मुकाबले 13 फीसदी घट गया और अप्रैल 2026 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। इसके बावजूद रूस भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में बना रहा। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में भारत ने रूस से कुल 4.1 अरब यूरो के जीवाश्म ईंधन खरीदे।


इसमें कच्चे तेल की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही। रूसी कच्चे तेल का मूल्य करीब 3.6 अरब यूरो था, जबकि कोयले और तेल उत्पादों का हिस्सा शेष रहा। भारत के लिए रूसी तेल की खरीद का आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों, परिवहन लागत, आपूर्ति की उपलब्धता और रिफाइनरियों की जरूरतों के आधार पर कंपनियां अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदने का फैसला करती हैं। दूसरी ओर, पश्चिमी देशों के प्रतिबंध और उनके नियम भारतीय रिफाइनरियों के निर्यात कारोबार को प्रभावित कर सकते हैं।


भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है और घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ रिफाइनिंग के बाद तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी करता है। रूसी कच्चे तेल को प्रोसेस करके तैयार उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचना रिफाइनिंग कारोबार का हिस्सा है। लेकिन प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले देशों को निर्यात करते समय उत्पाद की उत्पत्ति और लागू नियमों का पालन करना कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है। सितंबर के आंकड़े बताते हैं कि रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल करने वाली रिफाइनरियों से पश्चिमी देशों की ओर तेल उत्पादों की आपूर्ति बढ़ी है।


इससे एक तरफ भारत के रिफाइनिंग और निर्यात कारोबार की भूमिका सामने आती है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के पालन को लेकर निगरानी की जरूरत भी बढ़ती है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यूरोपीय संघ और अन्य पश्चिमी देश ऐसी खेपों की जांच किस तरह करते हैं और क्या प्रतिबंधों के नियमों में कोई अतिरिक्त स्पष्टता या बदलाव किया जाता है। फिलहाल CREA की रिपोर्ट ने वैश्विक ऊर्जा व्यापार में भारत की भूमिका और रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों के प्रभाव को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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