महतारी वंदन योजना: बम्हनी की ईश्वरी ने कैसे बदली अपनी तकदीर, जानिए आत्मनिर्भरता की यह अनूठी दास्तान...

पत्रकार अमृतेश्वर सिंह की क़लम से :-
वनांचल की गोद में बसे गांवों में जब सरकारी योजनाएं सही हाथों तक पहुंचती हैं, तो कैसे उम्मीदों के नए सूरज उगते हैं—इसकी एक बेहतरीन मिसाल पेश की है गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही (जीपीएम) जिले के पेण्ड्रा विकासखण्ड स्थित ग्राम बम्हनी की रहने वाली 40 वर्षीय ईश्वरी मरकार ने। महतारी वंदन योजना के तहत मिलने वाली सहायता राशि ने उनके जीवन में जो रंग भरे हैं, वह आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन चुके हैं।
उधार के दौर से आजादी का सफर -
बीता वक्त ईश्वरी के लिए आसान नहीं था। घर की छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के खातिर भी उन्हें अक्सर दूसरों के सामने हाथ पसारना पड़ता था या उधार मांगना पड़ता था। कई मर्तबा अर्जेंट जरूरत होने पर भी पैसे का इंतजाम नहीं हो पाता था, जिससे निराशा हाथ लगती थी। घर की सीमित आमदनी में बच्चों की पढ़ाई और गृहस्थी चलाना एक लोहे के चने चबाने जैसा था।

लेकिन, राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी महतारी वंदन योजना ने उनके जीवन की इस तस्वीर को काफी हद तक पलट दिया है। हर महीने बैंक खाते में आने वाली एक हजार रुपये की नियमित राशि ने उन्हें वह संबल दिया, जिसके बाद उन्हें अब किसी के आगे बेबस होकर खड़े होने की जरूरत नहीं पड़ती।
एक हजार रुपये को बनाया कमाई का जरिया -
ईश्वरी ने इस आर्थिक मदद का उपभोग केवल रोजमर्रा के खर्चों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने सूझबूझ दिखाते हुए इस राशि का एक हिस्सा अपनी घर के पीछे पड़ी बंजर या खाली जमीन को संवारने में लगाया। आज उसी जमीन पर लहलहाती सब्जी-बाड़ी उनके लिए वरदान साबित हो रही है।
ताजी सब्जियां और अतिरिक्त आमदनी: इस छोटी सी बाड़ी से जहां परिवार को रोजाना पौष्टिक और ताजी सब्जियां मुफ्त मिल रही हैं, वहीं अतिरिक्त उपज को स्थानीय बाजार में बेचकर वे रोजमर्रा के खर्चों के लिए अपनी अलग से इनकम भी जनरेट कर रही हैं।
बच्चों की पढ़ाई में राहत: इस छोटी बचत और कमाई का असर बच्चों की शिक्षा पर भी साफ दिख रहा है। कॉपियों, पेन और स्कूल की छोटी-मोटी जरूरतों के लिए अब पति या किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
आत्मसम्मान की सबसे बड़ी जीत -
पैसे की तंगी से उपजी लाचारी अब आत्मविश्वास में बदल चुकी है। ईश्वरी का मानना है कि जब सरकारी सहयोग के साथ खुद की मेहनत जुड़ जाती है, तो हालात बदलते देर नहीं लगती। उनकी यह सब्जी-बाड़ी आज सिर्फ हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि उनके मजबूत इरादों की गवाही दे रही है।






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