कच्चे खाद्य तेल पर शुल्क घटा, फिर भी रिफाइनरों की आय बढ़ने का अनुमान...

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :- भारत :- के खाद्य तेल आयात में आधे से अधिक हिस्सेदारी रखने वाला क्रूड पाम ऑयल (CPO), घरेलू खाद्य तेल बाजार के लिए कीमतों का मुख्य बेंचमार्क है। वैश्विक स्तर पर CPO की कीमतों में होने वाले बदलावों का असर घरेलू बाजारों पर भी पड़ता है। प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मौसम से जुड़ी आपूर्ति संबंधी चिंताओं और बायोडीजल की लगातार मांग के कारण, इस वित्त वर्ष में वैश्विक खाद्य तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहने की संभावना है।
क्रिसिल रेटिंग्स (Crisil Ratings) का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में वैश्विक स्तर पर CPO की कीमतों में 9-11 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। हालांकि सोयाबीन, सूरजमुखी और सरसों के तेल का अधिक उत्पादन कुछ राहत दे सकता है, लेकिन पाम ऑयल की सीमित आपूर्ति के कारण वैश्विक खाद्य तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहने की संभावना है।
खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने और आम लोगों के लिए इसे अधिक किफायती बनाने के उद्देश्य से, सरकार ने हाल ही में कच्चे (क्रूड) खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती की है।
क्रूड पाम ऑयल और सोयाबीन तेल पर प्रभावी आयात शुल्क 16.5 प्रतिशत से घटकर 11 प्रतिशत हो गया है, जबकि क्रूड सूरजमुखी तेल पर यह 16.5 प्रतिशत से घटकर 5.5 प्रतिशत रह गया है। हालांकि, कच्चे और रिफाइंड तेलों के बीच आयात शुल्क का एक बड़ा अंतर अभी भी बना हुआ है, जो घरेलू रिफाइनिंग गतिविधियों को बढ़ावा देना जारी रखेगा। "ड्यूटी के युक्तिकरण (rationalisation) से दूसरी छमाही में इंडस्ट्री की प्राप्ति (realisations) में 5-6 प्रतिशत की कमी आ सकती है, लेकिन इससे लोगों की खरीदने की क्षमता (affordability) बेहतर होगी, जिससे खपत (consumption) को नया बढ़ावा मिलेगा।
क्रिसिल रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर राहुल गुहा ने कहा, "हालांकि, पूरे साल के लिहाज से स्थिति अनुकूल बनी हुई है। वैश्विक स्तर पर खाद्य तेल की मजबूत कीमतों और पहली छमाही में अच्छी प्राप्ति के कारण, इस पूरे वित्त वर्ष में औसत प्राप्ति पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 8-10 प्रतिशत अधिक रहने की उम्मीद है।" रिपोर्ट के अनुसार, ऊंची कीमतों के बावजूद खपत मजबूत बनी रही है। दूसरी छमाही में, खासकर त्योहारी सीजन के दौरान, खुदरा कीमतों में कमी आने से लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ेगी, जिससे खपत में और तेजी आने की उम्मीद है।
घरेलू स्तर पर, फूड प्रोसेसिंग कंपनियों में, और होटल, रेस्तरां व कैटरिंग (HoReCa) सेगमेंट में मांग बढ़ने की संभावना है। इस वित्त वर्ष में खाद्य तेल की कुल खपत 2.7-3.0 प्रतिशत बढ़कर लगभग 26.5 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है। इसलिए, दूसरी छमाही में कीमतों में कुछ नरमी के बावजूद, औसत प्राप्ति में बढ़ोतरी और वॉल्यूम (बिक्री की मात्रा) में अच्छी वृद्धि के चलते, इस वित्त वर्ष में इंडस्ट्री के रेवेन्यू में जोरदार उछाल आने की उम्मीद है।
"वॉल्यूम में अच्छी वृद्धि और ऑपरेटिंग लीवरेज से मुनाफे को सहारा मिलेगा। प्रति टन EBITDA पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 10-12 प्रतिशत बढ़कर 3,850-3,950 रुपये रहने का अनुमान है।" क्रिसिल रेटिंग्स की डायरेक्टर जयश्री नंदकुमार ने कहा, "पहली छमाही में इन्वेंट्री से होने वाला फायदा दूसरी छमाही में कीमतों में कमी की भरपाई कर सकता है। इससे ऑपरेटिंग मार्जिन 3.4-3.6 प्रतिशत के स्तर पर काफी हद तक स्थिर रहेगा। साथ ही, समझदारी से की गई हेजिंग कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के असर को सीमित रखेगी।"
गुरुवार को आई एक रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे खाद्य तेल पर आयात शुल्क (import duty) में कटौती के बावजूद, भारत के खाद्य तेल रिफाइनरों की आय (revenue) में इस वित्त वर्ष 10-12 प्रतिशत की वृद्धि होने की उम्मीद है। हालांकि, इस सितंबर में आयात शुल्क में कटौती से चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में घरेलू स्तर पर मिलने वाली कमाई (realisations) कुछ कम हो सकती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर खाद्य तेल की ऊंची कीमतें, पहली छमाही का मजबूत प्रदर्शन और खपत में सुधार, आय में वृद्धि को सहारा देंगे।
क्रिसिल रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे खाद्य तेल पर आयात शुल्क कम होने के बावजूद, खाद्य तेल रिफाइनरों की आय में इस वित्त वर्ष 10-12 प्रतिशत की अच्छी वृद्धि होने की संभावना है। पिछले वित्त वर्ष में यह वृद्धि 14-16 प्रतिशत रही थी, जिसे दूसरी छमाही में कीमतों में हुई बढ़ोतरी से फायदा मिला था। वैश्विक स्तर पर खाद्य तेल की कीमतें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं। भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिससे यह उद्योग वैश्विक कीमतों में होने वाले बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील हो जाता है।






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