वोट चोरी का नैरेटिव गढ़ना विपक्ष की राजनीतिक विफलता का प्रमाण : सांसद संतोष पाण्डेय...

पत्रकार अमृतेश्वर सिंह की क़लम से :-
रायपुर। भारतीय जनता पार्टी के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता एवं सांसद संतोष पाण्डेय ने विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि निष्पक्ष चुनावी प्रणाली पर बेबुनियाद सवाल उठाकर जनता को भ्रमित करने का कुचक्र चलाया जा रहा है। मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में हो रहे व्यापक विकास कार्यों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए विपक्षी दल सोची-समझी रणनीति के तहत वोट चोरी का झूठा नैरेटिव गढ़ रहे हैं। यह बात उन्होंने राजधानी स्थित पार्टी कार्यालय में आयोजित एक पत्रकार वार्ता के दौरान कही।
चुनावी गड़बड़ियों के इतिहास पर रोशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि देश में लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने का पुराना इतिहास कांग्रेस का रहा है। वर्ष 1952 के आम चुनाव में कांग्रेस ने कम्युनिस्टों के साथ मिलकर बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को हराने की सुनियोजित साजिश रची थी। इसके बाद 1957 में बिहार के बेगूसराय में देश के पहले बूथ पर कब्जा करने की घटना सामने आई थी, जबकि 1967 में जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को चुनाव लड़ने से रोककर बिना किसी मुकाबले के इकतीस सीटें हथिया ली गई थीं।
इतिहास के अन्य काले अध्यायों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सन 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी ठहराया था और उन्हें छह साल के लिए किसी भी सार्वजनिक पद के अयोग्य घोषित कर दिया था। इसके अलावा 1987 के कश्मीर चुनाव में बड़े स्तर पर धांधली की गई और राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए देश भर में कई चुनी हुई सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त किया गया।
जनाधार में आई भारी गिरावट से बौखलाकर विपक्ष इस तरह के निराधार आरोप लगा रहा है। आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 1952 में कांग्रेस का वोट शेयर पैंतालीस प्रतिशत था, जो गिरकर हालिया लोकसभा चुनाव में महज इक्कीस दशमलव चार प्रतिशत पर सिमट गया है। जनता का विश्वास पूरी तरह खो चुके विपक्षी दलों के पास कोई सकारात्मक एजेंडा नहीं बचा है, इसलिए हार की हताशा में ईवीएम और वोट चोरी का राग अलापा जा रहा है।
विदेशों में जाकर संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ बयानबाजी करने की प्रवृत्ति पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा गया कि निर्वाचन आयोग भारतीय लोकतंत्र की मजबूत रीढ़ और जनादेश का सच्चा रक्षक है। पिछले सात दशकों में इस आयोग ने बीस आम चुनाव और चार सौ से अधिक विधानसभा चुनाव पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न कराए हैं। दुनिया की एक-छठी आबादी के लिए चुनाव प्रबंधन का निर्वहन करने वाला यह संस्थान वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र के सबसे सशक्त स्तंभों में शुमार है।
मतदाता सूची के शुद्धिकरण यानी एसआईआर प्रक्रिया पर कांग्रेस के अंतर्विरोध को उजागर करते हुए बताया गया कि केरल के पूर्व गृह मंत्री रमेश चेन्निथला और विधायक मैथ्यू कुझलनादन ने इस प्रक्रिया की उपयोगिता स्वीकार की थी। उनके अनुसार इस प्रणाली से फर्जी और दोहरे वोटों पर प्रभावी रोक लगी है। इसी प्रकार सांसद शशि थरूर ने भी इस दिशा में सकारात्मक रुख अपनाया था। यह साफ है कि चुनावी सूचियों को दुरुस्त करने का यह अभियान पूरी तरह पारदर्शी है और आजादी के बाद से अब तक विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में कई बार दोहराया जा चुका है।
संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की सुसंगत धाराओं के तहत यह पूरी प्रक्रिया संचालित होती है, जिसमें बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन किया जाता है। मृत, अनुपस्थित या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने से पहले आम नागरिकों से आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं और पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए अंतिम सूची का प्रकाशन किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसलों में इस बात को रेखांकित किया है कि पारदर्शी और त्रुटिहीन मतदाता सूची ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की असल नींव होती है।






.jpeg)
.jpeg)
.jpeg)
.jpg)




Comments