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बिलासपुर: पत्नी और दो बच्चों के भरण-पोषण मामले में सेना के जवान को राहत नहीं.....

Aug 16
2 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सेना के एक कर्मचारी को पत्नी और दो बच्चों के लिए हर महीने 22 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की 76,701 मासिक आय, कृषि से होने वाली आमदनी और परिवार के चिकित्सा, शिक्षा व रोजमर्रा के खर्च को देखते हुए यह राशि बहुत अधिक नहीं है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की पीठ ने आदेश में पति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अक्टूबर 2024 के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। पति ने दो बच्चों के पितृत्व पर सवाल उठाते हुए उनके लिए गुजारा भत्ता देने से इनकार किया था और डीएनए जांच की मांग भी की थी।


पारिवारिक न्यायालय ने 25 अक्टूबर 2024 को पत्नी को ₹10 हजार, चार वर्षीय बेटे को ₹7 हजार और दो वर्षीय बेटे को ₹5 हजार प्रतिमाह देने का आदेश दिया था। इस तरह कुल गुजारा भत्ता ₹22 हजार प्रतिमाह तय किया गया। पति की ओर से तर्क दिया गया कि उसकी पत्नी बीएड कर चुकी है और एक निजी स्कूल में लेक्चरर के रूप में करीब 15 हजार महीना कमाती है। इसके अलावा वह सिलाई और ब्यूटी पार्लर के काम से लगभग 6 हजार और कमाती है। पति ने यह भी कहा कि उसके बुजुर्ग माता-पिता हैं, जिनके इलाज का खर्च भी उसे उठाना पड़ता है।


सेना में ऑपरेशन थिएटर असिस्टेंट के रूप में कार्यरत कर्मचारी ने बताया कि मई 2015 में वह छत्तीसगढ़ से बाहर पदस्थ था। शादी के लिए उसने 61 दिन का अवकाश लिया था। पति ने वैवाहिक संबंधों में शुरुआत से ही विवाद होने का दावा किया और पत्नी पर कई आरोप लगाए। उसने दोनों बच्चों के पितृत्व पर संदेह जताते हुए डीएनए जांच कराने की मांग की। सितंबर 2019 में उसने तलाक की याचिका दाखिल की। इसके बाद पत्नी ने अपने और दोनों बच्चों के भरण-पोषण के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।


वर्ष 2021 में पारिवारिक न्यायालय ने अंतरिम गुजारा भत्ता 15 हजार रुपये प्रतिमाह तय किया था, जिसका भुगतान पति करता रहा। मार्च 2022 में अदालत ने डीएनए जांच की उसकी मांग को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि पारिवारिक न्यायालय ने पति को पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करने में सक्षम पाया था। पति की वेतन पर्ची के अनुसार उसका सकल मासिक वेतन 76,701 रुपये था। कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी गृहिणी है और उसके पास स्वतंत्र आय का कोई भरोसेमंद स्रोत नहीं है। इसके अलावा पति के पास 3 से 4 एकड़ पैतृक कृषि भूमि है, जिससे सालाना करीब 50 हजार से 60 हजार की आय होने की बात रिकॉर्ड में सामने आई।


हाई कोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता तय करते समय परिवार की सामाजिक स्थिति, जीवन स्तर, महंगाई, चिकित्सा खर्च, बच्चों की शिक्षा और रोजमर्रा की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन परिस्थितियों में पत्नी और दोनों बच्चों के लिए कुल 22 हजार रुपये प्रतिमाह की राशि को अत्यधिक नहीं कहा जा सकता। इसलिए पारिवारिक न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।

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