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महिला आरक्षण के पद मनमाने ढंग से दूसरे वर्ग को नहीं दे सकते: हाईकोर्ट...

Sep 3
3 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-

रायपुर :- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षक भर्ती से जुड़े एक अहम मामले में महिलाओं के आरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के लिए आरक्षित पदों को बिना किसी वैधानिक प्रावधान के पुरुष अभ्यर्थियों से भरना नियमों के विपरीत है। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की अदालत ने रायपुर नगर निगम की वर्ष 2013-14 की सहायक शिक्षक भर्ती में ओबीसी महिला वर्ग के 12 पदों पर पुरुष अभ्यर्थियों की नियुक्ति को गैरकानूनी माना है। मामला रायपुर नगर निगम द्वारा सहायक शिक्षक यानी शिक्षाकर्मी वर्ग-3 (विज्ञान) के कुल 204 पदों पर की गई भर्ती से जुड़ा है।


भर्ती प्रक्रिया में ओबीसी महिला वर्ग के लिए 12 पद आरक्षित किए गए थे। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन पदों पर पुरुष अभ्यर्थियों की नियुक्ति कर दी गई। इसी नियुक्ति को चुनौती देते हुए धमतरी निवासी नम्रता देवांगन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उन्होंने ओबीसी महिला वर्ग में 60.70 अंक हासिल किए थे और मेरिट सूची में उनका स्थान 1594वां था। उनका दावा था कि महिला वर्ग के लिए आरक्षित पद पुरुष अभ्यर्थियों को दिए जाने के कारण उन्हें वर्ष 2014 में नियुक्ति का अवसर नहीं मिल सका। यदि आरक्षित पदों पर नियमों के अनुसार महिला अभ्यर्थियों की नियुक्ति की जाती तो उन्हें भी चयन का अवसर मिल सकता था।


नगर निगम ने 1997 के सर्कुलर का दिया हवाला मामले की सुनवाई के दौरान रायपुर नगर निगम ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए वर्ष 1997 में जारी एक सर्कुलर का हवाला दिया। निगम की ओर से तर्क दिया गया कि ओबीसी महिला वर्ग की योग्य अभ्यर्थी न्यूनतम निर्धारित अंक हासिल नहीं कर सकीं। ऐसे में रिक्त रह गए पदों को उसी आरक्षित वर्ग के पुरुष अभ्यर्थियों से भर दिया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने नगर निगम की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि महिलाओं के लिए आरक्षित पदों को पुरुष अभ्यर्थियों से भरने के लिए स्पष्ट वैधानिक आधार होना आवश्यक है। केवल किसी पुराने सर्कुलर के आधार पर आरक्षित महिला पदों को पुरुष उम्मीदवारों से भरना उचित नहीं ठहराया जा सकता।


12 पुरुष शिक्षकों की नौकरी बरकरार हाईकोर्ट ने माना कि नगर निगम की भर्ती प्रक्रिया में हुई गलती के कारण नम्रता देवांगन को निर्धारित समय पर नियुक्ति का अवसर नहीं मिल पाया। हालांकि, अदालत ने इस मामले में करीब 12 साल पहले नियुक्त किए गए 12 पुरुष शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने का आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने माना कि इन शिक्षकों ने लंबे समय तक सेवा की है और इतने वर्षों बाद उनकी नियुक्ति समाप्त करने से उनके हित प्रभावित होंगे। इसलिए उनकी सेवाओं को बरकरार रखा गया। वहीं, याचिकाकर्ता नम्रता को बाद में गणित शिक्षिका के पद पर नियुक्ति मिल चुकी है।


मानसिक और आर्थिक नुकसान के लिए मुआवजा अदालत ने भर्ती प्रक्रिया में नगर निगम की गलती से याचिकाकर्ता को हुए नुकसान को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने माना कि गलत तरीके से महिला आरक्षित पदों को पुरुष अभ्यर्थियों से भरने के कारण नम्रता को समय पर नियुक्ति का अवसर नहीं मिल सका। इससे उन्हें मानसिक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने रायपुर नगर निगम कमिश्नर को नम्रता देवांगन को 3 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।


यह राशि भर्ती प्रक्रिया में हुई प्रशासनिक गलती के कारण हुए नुकसान की भरपाई के तौर पर दी जाएगी। हाईकोर्ट का यह फैसला महिला आरक्षण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश के जरिए स्पष्ट किया है कि आरक्षित वर्ग के पदों को बदलने या दूसरे वर्ग के अभ्यर्थियों से भरने की प्रक्रिया मनमाने तरीके से नहीं की जा सकती। इसके लिए संबंधित वैधानिक नियमों और प्रावधानों का पालन करना जरूरी है।

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