क्या मैरिटल रेप बनेगा अपराध? सुप्रीम कोर्ट में जल्द शुरू होगी सुनवाई....
- ANIS LALA DANI

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ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-
नई दिल्ली:- क्या शादी के बाद पत्नी की सहमति के बिना उसके साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आना चाहिए? मैरिटल रेप यानी वैवाहिक बलात्कार से जुड़े इस बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई होने वाली है। इस मामले में अदालत के सामने यह सवाल है कि क्या मौजूदा कानून में पति को मिली वैवाहिक अपवाद की व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए या नहीं। मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग लंबे समय से देश में बहस का विषय रही है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह किसी महिला की सहमति के अधिकार को खत्म नहीं करता। उनके मुताबिक, पत्नी को भी अपने शरीर और यौन संबंधों के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार है। यदि उसकी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाए जाते हैं तो उसे भी कानून के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।
मौजूदा कानून में क्या है व्यवस्था?
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा दी गई थी। इसमें एक अपवाद के तहत पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को, कुछ परिस्थितियों को छोड़कर, बलात्कार की श्रेणी से बाहर रखा गया था। हालांकि, 2024 में लागू हुए नए आपराधिक कानूनों के बाद IPC की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने ले ली है। BNS में भी वैवाहिक संबंध से जुड़ा अपवाद मौजूद है। इसी प्रावधान को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया है कि वैवाहिक रिश्ते के आधार पर किसी महिला की सहमति के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि कानून में ऐसी व्यवस्था होना समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ हो सकता है।
सरकार क्यों कर रही है विरोध?
केंद्र सरकार ने मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने का विरोध किया है। सरकार का प्रमुख तर्क है कि विवाह एक विशेष सामाजिक संस्था है और पति-पत्नी के बीच यौन संबंधों को सामान्य आपराधिक कानून के नजरिये से देखने से वैवाहिक संस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। सरकार की ओर से यह आशंका भी जताई गई है कि यदि वैवाहिक संबंधों में सहमति से जुड़े विवादों को बलात्कार के अपराध के दायरे में लाया जाता है तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। ऐसे मामलों में आरोप और साक्ष्य के बीच अंतर करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सरकार का यह भी कहना है कि विवाह के भीतर उत्पन्न होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए मौजूदा कानूनों में कई प्रावधान उपलब्ध हैं। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम सहित विभिन्न कानूनी उपायों के जरिए महिलाओं को सुरक्षा प्रदान की जाती है।
याचिकाकर्ताओं की क्या दलील?
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शादी किसी महिला को स्थायी सहमति देने के लिए बाध्य नहीं करती। उनका तर्क है कि किसी भी महिला को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कब और किस परिस्थिति में यौन संबंध बनाना चाहती है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, यदि किसी महिला की स्पष्ट इच्छा के खिलाफ उसके पति द्वारा जबरन संबंध बनाए जाते हैं तो केवल विवाह का रिश्ता आरोपी को विशेष कानूनी छूट नहीं दे सकता। उनके अनुसार, महिला की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता की रक्षा कानून का मूल उद्देश्य होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम?
मैरिटल रेप के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश के आपराधिक कानून और वैवाहिक अधिकारों पर दूरगामी असर डाल सकता है। अदालत को एक तरफ महिलाओं की गरिमा, निजता और सहमति के अधिकार से जुड़े संवैधानिक सवालों पर विचार करना होगा, वहीं दूसरी तरफ विवाह संस्था, आपराधिक कानून और कथित दुरुपयोग की आशंकाओं को भी देखना होगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि भारत में वैवाहिक संबंधों के भीतर सहमति की कानूनी स्थिति को किस तरह देखा जाए। फिलहाल, मामले की सुनवाई का इंतजार है और अदालत की दलीलों के बाद ही इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे की तस्वीर स्पष्ट होगी।




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