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क्यों फोड़ी जाती है दही हांडी ? जानिए धार्मिक मान्यता....

Sep 2
4 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव जन्माष्टमी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन देशभर के मंदिरों और घरों में बाल गोपाल की पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, कृष्ण की बाल लीलाओं की झांकियां निकाली जाती हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्म का उत्सव मनाया जाता है। जन्माष्टमी से जुड़ी सबसे लोकप्रिय परंपराओं में से एक दही हांडी है। इसमें ऊंचाई पर दही और माखन से भरी मटकी बांधी जाती है और युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ती है। महाराष्ट्र में यह परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है।


भगवान कृष्ण की माखन चोरी से जुड़ी है परंपरा

दही हांडी की परंपरा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं और कृष्ण से जुड़ी कथाओं के अनुसार बाल कृष्ण को दूध, दही और विशेष रूप से माखन बहुत पसंद था। वे अपने सखाओं के साथ गोपियों के घर पहुंचकर माखन खा लिया करते थे। इसी बाल लीला के कारण भगवान कृष्ण को प्रेम से ‘माखन चोर’ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि कृष्ण और उनके मित्रों की शरारतों से परेशान होकर गोपियां दही और माखन से भरी मटकियों को ऐसी ऊंची जगह पर लटकाने लगीं जहां बाल कृष्ण आसानी से न पहुंच सकें। लेकिन कान्हा अपने दोस्तों के साथ इसका भी उपाय निकाल लेते थे। कृष्ण के सखा एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड जैसी संरचना बनाते और कृष्ण ऊपर पहुंचकर मटकी से माखन निकाल लेते। आज दही हांडी में बनाया जाने वाला मानव पिरामिड इसी लोकप्रिय कथा का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है।


आखिर क्यों फोड़ी जाती है दही की मटकी ?

जन्माष्टमी के दौरान मटकी फोड़ने की परंपरा भगवान कृष्ण की इसी बाल लीला को जीवंत करने के लिए निभाई जाती है। मिट्टी की हांडी में दही, मक्खन और दूसरी सामग्री भरकर उसे काफी ऊंचाई पर बांधा जाता है। इसके बाद प्रतिभागियों की टोलियां एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर पिरामिड बनाती हैं। सबसे ऊपर पहुंचने वाला प्रतिभागी हांडी को फोड़ता है। महाराष्ट्र में इन प्रतिभागियों को आम तौर पर ‘गोविंदा’ और उनकी टीमों को गोविंदा पथक या मंडल कहा जाता है। हांडी फूटते ही पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता है। ढोल-नगाड़ों और ‘गोविंदा आला रे’ के जयघोष के बीच भगवान कृष्ण की बाल लीला को याद किया जाता है।


दही हांडी सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं

दही हांडी को धार्मिक आस्था के साथ ही एकता, टीमवर्क, साहस और आपसी सहयोग का प्रतीक भी माना जाता है। मानव पिरामिड तैयार करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे पर भरोसा करना पड़ता है। नीचे खड़े लोग पूरे पिरामिड का भार संभालते हैं, जबकि ऊपर चढ़ने वाले प्रतिभागियों को संतुलन और तालमेल बनाए रखना पड़ता है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग भी दही हांडी को टीम भावना, दृढ़ता और सामूहिक सहयोग प्रदर्शित करने वाले उत्सव के रूप में वर्णित करता है। आज कई स्थानों पर दही हांडी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है और सफल गोविंदा मंडलों को पुरस्कार भी दिए जाते हैं।


कब हुई दही हांडी की शुरुआत ?

दही हांडी की धार्मिक प्रेरणा कृष्ण की प्राचीन बाल-लीला कथाओं से जुड़ी है, लेकिन इसके आधुनिक सार्वजनिक और प्रतियोगितात्मक स्वरूप की किसी एक निश्चित शुरुआत को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं। कुछ लोकप्रिय विवरण घनसोली क्षेत्र में 1907 से इसके संगठित आयोजन का उल्लेख करते हैं, जबकि अन्य स्रोत महाराष्ट्र में इसके सार्वजनिक स्वरूप को व्यापक ऐतिहासिक विकास के रूप में देखते हैं। इसलिए 1907 को पूरी परंपरा की निर्विवाद शुरुआत मानने के बजाय इसे आधुनिक आयोजन से जुड़ा एक प्रचलित दावा कहना अधिक उचित है। समय के साथ दही हांडी महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बेहद लोकप्रिय हो गई। आज मुंबई, ठाणे और पुणे जैसे शहरों में बड़े स्तर पर आयोजन देखने को मिलते हैं। इसके अलावा गुजरात, गोवा और देश के दूसरे क्षेत्रों में भी कृष्ण जन्मोत्सव के दौरान मटकी फोड़ कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।


कैसे मनाया जाता है दही हांडी उत्सव ?

दही हांडी के लिए आमतौर पर मिट्टी की मटकी में दही, मक्खन, फल, मिठाई आदि रखकर उसे जमीन से काफी ऊपर रस्सी के सहारे बांधा जाता है। इसके बाद गोविंदा मंडलियां हांडी तक पहुंचने की कोशिश करती हैं। टीम के सदस्य एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते हुए कई स्तरों का मानव पिरामिड तैयार करते हैं। पिरामिड के सबसे ऊपर हल्के और फुर्तीले सदस्य को चढ़ाया जाता है। वह हांडी तक पहुंचकर उसे फोड़ता है। हांडी टूटने के बाद उसमें रखी सामग्री नीचे गिरती है और उत्सव का उल्लास चरम पर पहुंच जाता है। कई बड़े आयोजनों में विजेता टीम के लिए नकद पुरस्कार या अन्य इनाम भी रखे जाते हैं।


जन्माष्टमी के अगले दिन भी होता है आयोजन

दही हांडी का आयोजन कई क्षेत्रों, विशेष रूप से महाराष्ट्र में, जन्माष्टमी के अगले दिन गोपालकाला या नंदोत्सव से जोड़कर किया जाता है। हालांकि क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार आयोजन की तारीख अलग हो सकती है। 2026 में जन्माष्टमी का मुख्य उत्सव 4 सितंबर को माना जा रहा है और महाराष्ट्र में दही हांडी का आयोजन 5 सितंबर को होने की जानकारी दी गई है।


महाराष्ट्र में दिखता है सबसे ज्यादा उत्साह

दही हांडी का सबसे भव्य रूप महाराष्ट्र में देखने को मिलता है। मुंबई और ठाणे सहित कई शहरों में गोविंदा मंडलियां आयोजन से पहले मानव पिरामिड बनाने का अभ्यास करती हैं। बड़ी संख्या में लोग प्रतियोगिताएं देखने पहुंचते हैं और पूरा वातावरण कृष्ण भक्ति तथा उत्साह से भर जाता है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग के मुताबिक दही हांडी राज्य के प्रमुख उत्सवों में शामिल है और इसमें सामुदायिक भागीदारी इसकी बड़ी विशेषता है। कुल मिलाकर दही हांडी केवल मटकी फोड़ने की प्रतियोगिता नहीं है। इसके पीछे भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की स्मृति, भक्ति और सामूहिकता की भावना जुड़ी हुई है। ऊंचाई पर रखी हांडी तक पहुंचने के लिए जिस तरह पूरी टीम एक साथ प्रयास करती है, वह सहयोग और एकता का संदेश भी देती है। यही कारण है कि सदियों पुरानी धार्मिक कथा से प्रेरित यह परंपरा आधुनिक दौर में भी जन्माष्टमी उत्सव के सबसे आकर्षक हिस्सों में बनी हुई है।

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