लाल ग्रह के उपग्रह की मिट्टी से सुलझेंगे अंतरिक्ष के बड़े राज, जापान ने अंतरिक्ष में भेजा ऐतिहासिक यान...

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-
टोक्यो: क्या मंगल के पास चक्कर काटने वाले चांद की धूल और चट्टानें पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत की गुत्थी सुलझा सकती हैं? सौरमंडल की रचना के समय क्या हुआ था, इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए जापान ने एक बड़ा अंतरिक्ष अभियान शुरू कर दिया है। जापान की अंतरिक्ष एजेंसी (जाक्सा) ने एच-3 रॉकेट की मदद से 'एमएमएक्स' अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज दिया है। इस अनोखे मिशन का मकसद मंगल के फोबोस उपग्रह की सतह से धूल और पत्थरों के नमूने जुटाकर उन्हें वापस धरती पर लाना है।
क्योडो एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है जब किसी वैज्ञानिक मिशन के तहत मंगल के किसी चांद से मिट्टी लाकर यहां उसकी जांच की जाएगी। करीब 57.8 करोड़ डॉलर के इस प्रोजेक्ट के जरिए 10 ग्राम सैंपल इकट्ठा करने का प्लान है, जिसके 2031 तक धरती पर लौटने की उम्मीद है। तनेगाशिमा स्पेस सेंटर से सुबह के वक्त रॉकेट ने उड़ान भरी और तय समय पर अंतरिक्ष यान ने मुख्य रॉकेट से अलग होकर अपनी राह पकड़ ली।
मंगल ग्रह के दो प्राकृतिक चांद हैं— फोबोस और डिमोस। इनमें से फोबोस लाल ग्रह के काफी पास है और कम दूरी से उसकी परिक्रमा करता है। वैज्ञानिकों के बीच लंबे समय से इस बात को लेकर बहस जारी है कि इन दोनों का वजूद कैसे आया। एक थ्योरी कहती है कि मंगल से किसी भारी वस्तु के टकराने से उड़े मलबे से ये बने हैं, जबकि दूसरी थ्योरी मानती है कि ये असल में एस्टेरॉयड हैं जो मंगल के गुरुत्वाकर्षण के दायरे में फंस गए।
फोबोस से मिलने वाले सैंपल्स से इन दोनों थ्योरीज की सच्चाई सामने आ सकती है। इसके अलावा, इन टुकड़ों में मंगल ग्रह के भी कुछ अंश मिलने की संभावना है, जिससे लाल ग्रह के पुराने इतिहास और अंदरूनी बनावट को समझने में मदद मिलेगी। लगभग पांच टन वजनी यह यान अगस्त 2027 तक मंगल की कक्षा में पहुंचेगा और वहां रहकर फोबोस के गुरुत्वाकर्षण और सतह का बारीकी से अध्ययन करेगा।
इस अभियान में फ्रांस और जर्मनी के साथ मिलकर बनाया गया 'इडेफिक्स' नाम का एक छोटा रोवर भी भेजा गया है, जो फोबोस की ज़मीन पर उतरकर करीब 100 दिन बिताएगा। यह रोवर ऐसी सुरक्षित जगहों की तलाश करेगा जहां मुख्य यान उतरकर सैंपल ले सके। चूंकि फोबोस पर गुरुत्वाकर्षण बहुत कम है, इसलिए वहां किसी यान को उतारना और मिट्टी उठाना इंजीनियरों के लिए एक बड़ी चुनौती था। मुख्य लैंडर ज़मीन पर सिर्फ दो घंटे रहकर सैंपल पैक करेगा और फिर वापसी का सफर शुरू करेगा, रास्ते में डिमोस का भी जायजा लिया जाएगा।
इस खोज का दायरा सिर्फ चांद की पैदाइश तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह भी पता चलेगा कि शुरुआती दौर में पानी और कार्बनिक तत्व अंतरिक्ष में कैसे फैले, जो आगे चलकर जीवन पनपने में मददगार साबित होते हैं। भले ही इन नमूनों में सीधे तौर पर जीवन के सबूत मिलने की उम्मीद कम है, लेकिन ब्रह्मांड के विकास से जुड़े अनगिनत रहस्यों से पर्दा ज़रूर उठ जाएगा। नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसियों के सहयोग से चल रहा यह प्रयास भविष्य में मानव बस्तियों को मंगल पर भेजने की राह भी आसान कर सकता है।






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