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महासमुंद में ‘खेत बचाओ अभियान’ का असर, 813 किसानों ने छोड़ी रासायनिक खाद.....

Jul 18
2 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कृषि विभाग द्वारा मिट्टी के स्वास्थ्य के संरक्षण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया जा रहा है, जिसके बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं, इस अनोखी पहल से प्रभावित होकर जिले के 813 किसानों ने रासायनिक उर्वरकों पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह खत्म करते हुए हरी खाद ढैंचा की ओर अपना रुख कर लिया है, कृषि विभाग ने इस अभियान को गति देने के लिए जिले के सभी विकासखंडों में किसानों को ढैंचा बीज उपलब्ध कराए हैं, जिसके तहत अब तक रिकॉर्ड 103 क्विंटल ढैंचा बीज का वितरण किया जा चुका है, इस वितरण के जरिए वर्तमान में जिले की 376 हेक्टेयर कृषि भूमि पर हरी खाद तैयार करने का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, ढैंचा एक दलहनी फसल है जो वायुमंडल से सीधे नाइट्रोजन सोखकर मिट्टी तक पहुंचाने का अद्भुत काम करती है |


किसान इस फसल में फूल आने से पहले ही इसे रोटावेटर या हल की मदद से खेत के भीतर ही जोत देते हैं, जो मिट्टी में सड़ने के बाद शुद्ध जैविक खाद में तब्दील हो जाता है. यह प्राकृतिक प्रक्रिया मिट्टी को अत्यधिक उपजाऊ बनाती है, क्योंकि इससे जमीन को फास्फोरस, जिंक और आयरन जैसे अत्यंत आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मिलते हैं, इस हरी खाद के इस्तेमाल से खेतों की जल धारण क्षमता में जबरदस्त वृद्धि होती है और यह खाद मिट्टी में एक स्पंज की तरह काम करती है, जिससे कड़क धूप में भी खेतों में नमी लंबे समय तक बरकरार रहती है. हरी खाद के फायदों को लेकर उप संचालक कृषि एफआर कश्यप ने जिले के सभी किसानों से विशेष अपील की है कि वे खरीफ फसलों की मुख्य बुवाई शुरू करने से पहले अपने खेतों में ढैंचा या सनई जैसी हरी खाद का उपयोग अवश्य करें |


उन्होंने कहा कि हरी खाद न केवल मिट्टी की उर्वरक शक्ति को दीर्घकाल तक बनाए रखती है, बल्कि यह भविष्य की टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती के लिए एक अनिवार्य कदम है | इस तकनीक को अपनाने से रासायनिक उर्वरकों की जरूरत नाममात्र की रह जाती है, जिससे किसानों की खेती की इनपुट लागत में सीधी कमी आती है और उनका मुनाफा बढ़ जाता है. इस अभियान से जुड़कर जिले के कई किसान अपनी कामयाबी की नई इबारत लिख रहे हैं, बसना के ग्राम बड़ेसाजापाली के प्रगतिशील किसान हिमांशु बंजारे ने अपने 0.80 हेक्टेयर खेत में ढैंचा लगाया है और उनका मानना है कि इस जैविक तरीके से न केवल मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा, बल्कि फसल की लागत भी कम होगी, इसी तरह पिथौरा के ग्राम कौहाकुड़ा के रूक्मण नायक ने 7 एकड़ में इस फसल को लिया है |

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