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सरकार बताये तारा कोल ब्लॉक नीलामी कब रद्द होगी ? - दीपक बैज...

Oct 5
2 min read

पत्रकार अमृतेश्वर सिंह की क़लम से :-

रायपुर: छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक संपदा और पर्यावरण के संरक्षण को लेकर सियासी घमासान एक बार फिर तेज हो गया है। प्रदेश में जंगलों की कटाई और कोयला खदानों को लेकर सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। पर्यावरण प्रेमियों और राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है कि विकास के नाम पर किस तरह अमूल्य हरियाली और वन्यजीवों के आशियाने उजाड़े जा रहे हैं।


लाखों पेड़ों की कटाई और हाथियों के कॉरिडोर पर संकट -

मामले को लेकर मुखर विरोध दर्ज कराते हुए कहा गया है कि तारा कोल ब्लॉक लगभग 5000 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 4000 एकड़ से अधिक घना और समृद्ध जंगल मौजूद है। इस परियोजना के चलते करीब 10 लाख से अधिक पेड़ों को काटे जाने की आशंका है। इसके अलावा, लेमरू एलीफेंट रिजर्व के आसपास होने वाले खनन से राष्ट्रीय धरोहर माने जाने वाले हाथियों के आवागमन के रास्तों पर गंभीर असर पड़ेगा। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हाथियों और अन्य दुर्लभ प्रजातियों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।


पिछली और वर्तमान सरकार के फैसलों पर आमने-सामने -

सवालों के घेरे में यह बात भी उठी है कि क्या राज्य सरकारों के फैसलों से ही ऐसे संवेदनशील इलाकों में कॉर्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि पिछली सरकार ने जहां इन क्षेत्रों को नीलामी से बाहर रखने का प्रयास किया था, वहीं मौजूदा सरकार ने इसके विपरीत कदम उठाते हुए अनुशंसा पत्र भेजे। जानकारों का कहना है कि केते एक्सटेंशन ओपन कास्ट माइनिंग और अन्य परियोजनाओं के लिए वन भूमि डायवर्जन की जो प्रक्रिया आगे बढ़ी है, उससे सेंट्रल इंडिया का 'लंग्स ज़ोन' कहे जाने वाला यह हरा-भरा इलाका पूरी तरह तबाह हो सकता है।


आदिवासियों का संघर्ष और सांस्कृतिक धरोहर पर आंच -

हसदेव अरण्य का यह पूरा क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां स्थानीय आदिवासी समुदाय अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए लंबे समय से सड़कों पर हैं। आरोप है कि स्थानीय ग्राम सभाओं के विरोध प्रस्तावों और महीनों से चल रहे आंदोलनों को नजरअंदाज किया जा रहा है। साथ ही, रामगढ़ की पहाड़ियों, प्राचीन नाट्यशाला, सीता गुफा और भगवान श्रीराम के वन गमन पथ से जुड़ी ऐतिहासिक तथा धार्मिक स्मृतियों को भी खनन परियोजनाओं के कारण भारी खतरे में डाला जा रहा है।

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