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सुप्रीम कोर्ट: मोटर दुर्घटना मामले में विवाहित व नौकरीपेशा बच्चे भी हैं कानूनी प्रतिनिधि....

Aug 15
3 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजे को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि मृत माता-पिता के बालिग, विवाहित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बच्चे भी मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा कर सकते हैं। हालांकि, मुआवजे की राशि इस बात पर निर्भर करेगी कि वे मृतक पर कितने आश्रित थे। न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि मोटर वाहन अधिनियम में "कानूनी प्रतिनिधि" शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। ऐसे में इसका अर्थ व्यापक रूप से समझा जाना चाहिए।


कानूनी प्रतिनिधि की व्याख्या की सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानूनी प्रतिनिधि से आशय ऐसे व्यक्ति से है जो कानून के तहत मृत व्यक्ति की संपत्ति या हितों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार रखता है। पीठ ने कहा कि मोटर दुर्घटना के मामलों में मुआवजे का उद्देश्य केवल आर्थिक नुकसान की भरपाई करना नहीं है, बल्कि मृतक के परिवार को हुई क्षति को ध्यान में रखना भी है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का बालिग होना, शादीशुदा होना या नौकरी करना अपने आप में उसे मुआवजे के दावे से बाहर नहीं करता।


निर्भरता के आधार पर तय होगी राशि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजा पाने का अधिकार और मुआवजे की मात्रा दो अलग-अलग बातें हैं। बालिग और नौकरीपेशा बच्चे कानूनी प्रतिनिधि के रूप में दावा कर सकते हैं, लेकिन मुआवजे की गणना करते समय यह देखा जाएगा कि वे मृत माता-पिता पर आर्थिक रूप से कितने निर्भर थे। यदि कोई बच्चा पूरी तरह आत्मनिर्भर था और मृतक की आय पर निर्भर नहीं था, तो मुआवजे की राशि उसी अनुसार तय की जाएगी। मोटर वाहन अधिनियम के उद्देश्य पर जोर पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य दुर्घटना में पीड़ित परिवारों को राहत प्रदान करना है। इसलिए इसकी व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जिससे प्रभावित लोगों को न्याय मिल सके।


अदालत ने कहा कि केवल तकनीकी आधार पर किसी व्यक्ति को मुआवजे के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। विवाहित बच्चों के अधिकार पर भी स्थिति साफ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शादीशुदा बच्चे भी मृत माता-पिता के कानूनी प्रतिनिधि हो सकते हैं। विवाह के बाद भी माता-पिता और बच्चों के बीच कानूनी संबंध समाप्त नहीं होता। चार साल में सबसे छोटा संबोधन अदालत ने कहा कि परिवारिक संबंध और कानूनी अधिकार केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर खत्म नहीं हो जाते। मुआवजा मामलों में आएगा असर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर देशभर में चल रहे मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों पर पड़ सकता है। अब अदालतों और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों को ऐसे मामलों में कानूनी प्रतिनिधि की अवधारणा को व्यापक नजरिए से देखना होगा।


इस फैसले से उन परिवारों को राहत मिल सकती है, जहां मृत व्यक्ति के बच्चे बालिग, विवाहित या नौकरीपेशा हैं, लेकिन फिर भी वे माता-पिता के साथ पारिवारिक और आर्थिक संबंध रखते थे। पीठ ने दिया न्याय का व्यापक दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून की व्याख्या करते समय सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना जरूरी है। आज के समय में परिवारों की संरचना और आर्थिक परिस्थितियां बदल रही हैं। ऐसे में केवल उम्र, वैवाहिक स्थिति या रोजगार के आधार पर किसी को मुआवजे के अधिकार से बाहर करना उचित नहीं होगा। अदालत ने कहा कि हर मामले में तथ्यों के आधार पर यह तय किया जाना चाहिए कि मृतक और दावेदार के बीच आर्थिक संबंध किस प्रकार के थे।


पीड़ित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण फैसला विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि कानूनी प्रतिनिधि की अवधारणा केवल आश्रित परिवार के सदस्यों तक सीमित नहीं है। हालांकि, मुआवजे की गणना करते समय वास्तविक आर्थिक निर्भरता को प्रमुख आधार बनाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश दिया है कि दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु से प्रभावित परिवार के अधिकारों को केवल पारंपरिक मानकों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कानूनी प्रक्रिया में मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है।



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