गुरुकुल पद्धति की पुनर्स्थापना से ही संभव है राष्ट्र निर्माण: राहुल परिहार...

पत्रकार अमृतेश्वर सिंह की कलम से :-
रायपुर: शिक्षा केवल अक्षरों का ज्ञान नहीं, बल्कि किसी भी राष्ट्र, समाज, संस्कृति और व्यक्ति के आत्मसम्मान की असली पहचान होती है। भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा का मुख्य ध्येय व्यक्ति को चरित्रवान, सुसंस्कृत और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित नागरिक बनाना था। दुर्भाग्यवश, औपनिवेशिक षड्यंत्रों के चलते देश की मूल शिक्षण पद्धति को विकृत कर दिया गया, जिसके दुष्परिणामस्वरूप आज की पीढ़ी में हीनभावना, अवसाद और सांस्कृतिक अलगाव देखने को मिल रहा है। यह बात शिवसेना (यूबीटी) छत्तीसगढ़ के प्रदेश उपाध्यक्ष राहुल सिंह परिहार ने कही।
परिहार ने कहा कि लार्ड मैकाले की थोपी गई व्यवस्था ने भारत की समृद्ध शैक्षणिक व सांस्कृतिक नींव पर गहरा प्रहार किया। इसका उद्देश्य विद्या को लोककल्याणकारी माध्यम बनाने के बजाय केवल निजी स्वार्थ और संकीर्ण दायरे तक समेटना था। आज हालात यह हैं कि ज्ञानार्जन की पवित्रता पर व्यावसायिकता और व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हो चुके हैं।
उन्होंने आगे आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब देश मैकाले की थोपी गई मानसिक दासता के बंधनों को पूरी तरह तोड़े। शिक्षा को सबके लिए सर्वसुलभ बनाते हुए अपनी मातृभाषा, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी, तभी एक सशक्त और स्वाभिमानी भारत का निर्माण संभव है।






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