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सावन में कांवड़ियों से लेकर श्रद्धालुओं तक उमड़ता है आस्था का सैलाब.....

Aug 17
4 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-

महासमुंद सावन में महासमुंद की धरती सिर्फ हरियाली से नहीं, महादेव की भक्ति से भी सराबोर होती है। जिले के प्राचीन शिवधामों में कहीं स्वयंभू शिवलिंग, कहीं दिव्य प्राकट्य और कहीं सदियों पुरानी लोकमान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती हैं। सिरपुर से बम्हनी और भंवरपुर से ताला तक इन चार शिवधामों की गाथा इतिहास, आस्था और रहस्य का ऐसा संगम है, जहां सावन में हजारों कदम भोलेनाथ के दरबार की ओर बढ़ते हैं। कांवड़ियों के जयघोष, जलाभिषेक और मंदिरों में होने वाले विशेष अनुष्ठानों से पूरा अंचल शिवमय हो उठता है।


(1) गंधेश्वर महादेव- 8वीं शताब्दी से आस्था, शिवलिंग से सुगंध की मान्यता

महानदी के पावन तट पर मनोरम प्राकृतिक परिवेश के बीच विराजमान भगवान गंधेश्वर महादेव का मंदिर सिरपुर की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है। मंदिर के निर्माण को 8वीं शताब्दी में बालार्जुन के काल से जोड़ते हुए बाणासुर द्वारा निर्माण कराए जाने की स्थानीय मान्यता है।करीब दो हजार वर्ष पुरानी आस्था से जुड़े इस धाम को भगवान शिव की महिमा के कारण छत्तीसगढ़ का ‘बाबा धाम’ भी कहा जाता है। गंधेश्वर महादेव की सबसे अनूठी पहचान गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग से जुड़ी सुगंध की मान्यता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि शिवलिंग से आज भी विशेष गंध आती है, इसी कारण भगवान शिव यहां ‘गंधेश्वर’ कहलाते हैं। प्रचलित देवकथा के अनुसार बाणासुर भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और पूजा के लिए काशी जाया करते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कहा कि अब उन्हें काशी आने की आवश्यकता नहीं, वे स्वयं सिरपुर में प्रकट होंगे। बाणासुर ने पूछा कि उनके प्रकट स्वरूप की पहचान कैसे होगी। तब भोलेनाथ ने संकेत दिया कि जिस शिवलिंग से विशेष गंध महसूस हो, उसे उनका स्वरूप मानकर पूजा करें। मान्यता है कि इसी दिव्य संकेत के बाद गंधेश्वर महादेव की आराधना प्रारंभ हुई। प्राचीन स्थापत्य और महानदी का मनोहारी तट आज भी श्रद्धालुओं व पर्यटकों को आकर्षित करता है।


(2) शिव-पार्वती मंदिर,- 150 साल पुराना धाम, स्वप्न में मिले भोलेनाथ

भंवरपुर में देव तालाब रानीसागर के समीप स्थित करीब 150 वर्ष पुराना शिव-पार्वती मंदिर क्षेत्र की गहरी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां विराजमान शिवलिंग स्वयंभू है। सावन, फाल्गुन और महाशिवरात्रि पर यहां दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। श्रावण के अंतिम सोमवार को महानदी तट और ओड़िशा के नरसिंहनाथ धाम से कांवड़िए पवित्र जल लेकर पहुंचते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। मंदिर के पुजारी रामदास वैष्णव और ग्रामीण बुजुर्गों के अनुसार भैंना राजवंश के समय यहां खेत हुआ करता था। कुआं खोदते समय किसान को जमीन में एक गोल पत्थर मिला। उसे निकालने के कई प्रयास विफल रहे। कुदाल से प्रहार करने पर पत्थर पर निशान तो पड़ा, लेकिन वह नहीं टूटा। उसी रात किसान को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर बताया कि यह साधारण पत्थर नहीं, बल्कि स्वयंभू शिवलिंग है। अगले दिन शिवलिंग जमीन से उभरा मिला और वहीं पूजा शुरू हुई। 1986 में जीर्णोद्धार के दौरान शिवलिंग को हटाने के लिए गहरी खुदाई की गई, लेकिन उसका दूसरा छोर नहीं मिला। मान्यता है कि शिवलिंग अब करीब तीन फीट ऊंचा दिखाई देता है। श्रद्धालु यहां संतान सुख, रोग मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए नारियल चढ़ाते हैं। परिसर में भगवान जगन्नाथ और संतोषी माता के मंदिर भी हैं।


(3) बम्हनी का ब्रह्मनेश्वरनाथ धाम- तपस्या से प्रकट हुई ‘श्वेत गंगा’

घने जंगलों और प्राकृतिक रमणीयता के बीच स्थित श्री ब्रह्मनेश्वरनाथ महादेव मंदिर क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक धरोहर है। मंदिर की वास्तविक प्राचीनता का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय मान्यता के अनुसार इसका निर्माण विक्रम संवत 1960 के आसपास पंचवटी परिवार ने कराया था। किंवदंती के अनुसार उस समय यहां घना जंगल था। पंचवटी परिवार के अर्जुन प्रसाद की मुलाकात भ्रमण के दौरान परम तेजस्वी ऋषि देवल से हुई, जो वटवृक्ष के नीचे तपस्या करते थे। मान्यता है कि ऋषि देवल की साधना और कृपा से यहां ब्रह्मनेश्वरनाथ महादेव के साथ ‘श्वेत गंगा’ का प्राकट्य हुआ। मंदिर के समीप कुंड में गर्म जल की धारा प्रवाहित होने की मान्यता है। वटवृक्ष के नीचे ऋषि देवल का आसन आज भी श्रद्धा का केंद्र है। परिसर में नर्मदेश्वरनाथ महादेव, रामेश्वर, हनुमान और केवट समाज के शिव मंदिर भी हैं। सावन में कांवड़िए यहां के कुंड का जल लेकर सिरपुर, राजिम, चंपारण, दलदली और महादेवघाट जैसे शिवस्थलों तक पहुंचते हैं। माघ पूर्णिमा पर विशाल मेला और महाशिवरात्रि पर पंचकोशी साधुओं का यज्ञ यहां की धार्मिक परंपरा को जीवंत रखता है।


(4) 300 साल पुराना सपनेश्वर धाम- स्वप्न में मिले भोलेनाथ

प्रकृति की मनोरम वादियों के बीच चकदरहा नाला के समीप स्थित करीब 300 वर्ष पुराना महाकालेश्वर सपनेश्वर मंदिर क्षेत्र की गहरी धार्मिक आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां विराजमान शिवलिंग स्वयंभू है। श्रद्धालु भगवान शिव को ‘वरदायी महादेव’ मानकर संतान सुख, रोग मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं। गांव के बुजुर्गों के अनुसार करीब तीन शताब्दी पहले मंदिर स्थल घने जंगल से घिरा था। आदिवासी शिकार पर जाने से पहले यहां एक पत्थर पर अपने हथियारों को धार दिया करते थे। एक बार पत्थर को उठाने का प्रयास किया गया, लेकिन वह नहीं उठा। इसके बाद तत्कालीन गौटिया बालकी प्रधान को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर उसी स्थान पर अपनी उपस्थिति बताई और पूजा व मंदिर निर्माण का निर्देश दिया। तभी से यहां ‘सपनेश्वर’ के रूप में शिवलिंग की पूजा शुरू हुई। मिट्टी-खपरैल से शुरू हुआ मंदिर आज भव्य स्वरूप ले रहा है। महाशिवरात्रि पर चार प्रहर पूजा, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप और महाआरती होती है। सावन के अंतिम सोमवार को राजिम, जैतपुर, चंद्रपुर और ओड़िशा के नरसिंहनाथ धाम से बड़ी संख्या में कांवड़िए जल लेकर यहां पहुंचते हैं। मंदिर में अदृश्य शंख-घंटी की ध्वनि और नाग दर्शन से जुड़ी मान्यताएं भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं।


चारों धामों की कथाएं अलग हैं, लेकिन आस्था एक महादेव। सावन में जब कांवड़ियों के कदम इन प्राचीन शिवस्थलों की ओर बढ़ते हैं, तो महासमुंद की धरती हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठती है।

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