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सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा, फर्जी कागजात तैयार कर करोड़ों की संपत्ति हड़पी...

2 hours ago
2 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-

रायपुर। राजधानी के पंडरी तराई इलाके में एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जहां राजस्व दस्तावेजों में सरकारी दर्ज जमीन को सांठगांठ कर अपने नाम करवा लिया गया। खसरा नंबर 197/3 की इस जमीन को लेकर प्रशासन के तमाम बड़े अधिकारियों से लेकर पंजीयन कार्यालय तक शिकायत दर्ज कराई गई है। इस मामले में शुरुआती जांच से ही पटवारी से लेकर अन्य जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की संदिग्ध भूमिका उजागर हो रही है।


शिकायत के मुताबिक, पंडरी तराई स्थित इस सरकारी भूखंड को सुनियोजित तरीके से दस्तावेजों में फेरबदल कर रमेश कुमार, वीरेंद्र गोयल, रमेश गोयल और संजय गोयल ने अपने नाम पर पंजीकृत करा लिया। हैरानी की बात यह है कि इस जमीन का कभी कोई आधिकारिक बंटांकन नहीं हुआ था, इसके बावजूद इसके हिस्से करके कई लोगों और कंपनियों के पक्ष में धड़ल्ले से रजिस्ट्रियां की जाती रहीं। राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट में भी यह जमीन स्पष्ट रूप से शासकीय दर्ज है, जिससे स्टाम्प ड्यूटी चोरी और भारी वित्तीय नुकसान का यह मामला और गहरा गया है।


दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह खेल लंबी अवधि से चल रहा है। शुरुआती दौर में रमेश कुमार द्वारा गोयल वनस्पति प्रोडक्ट्स लिमिटेड के पक्ष में अलग-अलग तारीखों में बड़े हिस्से की रजिस्ट्री की गई। इसके बाद बिना वैध स्थानांतरण के यही जमीनें आगे चलकर भगवती पावर एंड स्टील लिमिटेड, बालकृष्ण स्टील प्राइवेट लिमिटेड और बंटी अग्रवाल जैसे खरीदारों के नाम पर ट्रांसफर कर दी गईं। दस्तावेजों में कंपनियों के नाम बदलने और अचल संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर गंभीर अनियमितताएं बरती गईं, जो बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं थीं।


कानूनन किसी भी फर्म का नाम बदलना और जमीन का भूमिस्वामी बनना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। फर्म के नाम में बदलाव का अधिकार कंपनी रजिस्ट्रार के पास होता है, न कि किसी अचल संपत्ति के अनाधिकृत हस्तांतरण का। इसके बावजूद लगभग दस अलग-अलग फर्जी रजिस्ट्रियों का अंजाम तक पहुंचना उच्चस्तरीय जांच की मांग करता है। शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण में लगभग तीस करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी संपत्ति के घोटाले की आशंका जताई है। ऑनलाइन 'भुईयां' पोर्टल पर आज भी यह जमीन सरकारी दर्ज है, इसके बावजूद भूमाफियाओं ने अधिकारियों की मिलीभगत से इसे निजी संपत्ति की तरह बेच डाला। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में कितनी जल्दी ठोस कार्रवाई करते हुए दोषियों को बेनकाब करता है।

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