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छत्तीसगढ़: 18 साल सेवा के बाद शिक्षिका को हटाना अवैध....

Aug 27
3 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर के राजकुमार कॉलेज की एक शिक्षिका को करीब 18 साल की सेवा के बाद नौकरी से हटाने के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कॉलेज प्रबंधन की ओर से शिक्षिका को सेवा से हटाने के फैसले को अवैध माना है। अदालत ने सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए शिक्षिका को दोबारा नौकरी पर रखने और बकाया वेतन 9 प्रतिशत ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने राजकुमार कॉलेज प्रबंधन की अपील खारिज कर दी।


1990 में ओडिया शिक्षिका के पद पर हुई थी नियुक्ति

मामला राजकुमार कॉलेज रायपुर में कार्यरत रहीं सविता मोहंती से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, कॉलेज प्रबंधन ने 21 जून 1990 को सविता मोहंती को ओडिया भाषा पढ़ाने के लिए सहायक शिक्षिका के पद पर नियुक्त किया था। नियुक्ति के करीब चार साल बाद 1994 में उनकी सेवा नियमित कर दी गई। इसके बाद उन्हें हर वर्ष वेतन वृद्धि भी मिलती रही। इस तरह सविता मोहंती ने कॉलेज में लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं। करीब 18 साल तक नौकरी करने के बाद 19 जून 2008 को कॉलेज प्रबंधन ने अचानक उनकी सेवा समाप्त कर दी। प्रबंधन ने शिक्षिका को हटाने के पीछे मुख्य कारण स्कूल में ओडिया भाषा पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में कमी को बताया था।


बीएड डिग्री नहीं होने का भी दिया था आधार

कॉलेज प्रबंधन की ओर से यह भी तर्क दिया गया था कि सविता मोहंती के पास बीएड की डिग्री नहीं है। इसलिए उन्हें किसी अन्य विषय की शिक्षिका के रूप में भी समायोजित नहीं किया जा सकता। नौकरी समाप्त किए जाने के फैसले के बाद शिक्षिका ने इसका विरोध किया और संबंधित अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील की। 8 मई 2012 को अपीलीय अधिकारी ने शिक्षिका के पक्ष में फैसला सुनाया। अधिकारी ने उन्हें दोबारा सेवा में रखने का आदेश दिया। इसके साथ ही पिछला पूरा वेतन 9 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश भी दिया गया।


कॉलेज प्रबंधन पहुंचा हाईकोर्ट

अपीलीय अधिकारी के आदेश को चुनौती देते हुए राजकुमार कॉलेज प्रबंधन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के बाद सिंगल बेंच ने 17 मार्च 2026 को कॉलेज प्रबंधन की याचिका खारिज कर दी। सिंगल बेंच के फैसले से असंतुष्ट कॉलेज प्रबंधन ने इसके खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील दायर की। डिवीजन बेंच के समक्ष दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं। सुनवाई के दौरान शिक्षिका की नियुक्ति से संबंधित दस्तावेजों और सेवा की परिस्थितियों को भी अदालत के सामने रखा गया।


18 साल बाद बीएड को आधार बनाना सही

नहीं डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि वर्ष 1990 में जारी नियुक्ति पत्र में बीएड की डिग्री को अनिवार्य योग्यता के रूप में निर्धारित नहीं किया गया था। इसके अलावा वर्ष 1994 में जब शिक्षिका की सेवा नियमित की गई, तब भी कॉलेज प्रबंधन ने बीएड की डिग्री नहीं होने को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई थी। अदालत ने यह भी गौर किया कि वर्ष 2008 में शिक्षिका को नौकरी से हटाने के समय कॉलेज प्रबंधन की ओर से मुख्य वजह ओडिया पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कम होना बताई गई थी। ऐसे में करीब 18 वर्ष की सेवा के बाद बीएड की डिग्री नहीं होने को आधार बनाकर शिक्षिका की सेवा समाप्त करना उचित नहीं माना जा सकता। सभी तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने राजकुमार कॉलेज प्रबंधन की अपील खारिज करते हुए शिक्षिका को पुनः सेवा में लेने और बकाया वेतन का भुगतान 9 प्रतिशत ब्याज के साथ करने के निर्देश को बरकरार रखा।

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