छतीसगढ़: तारा कोल ब्लॉक नीलामी के विरोध में गरमाई सियासत, कांग्रेस ने साय सरकार पर उठाए गंभीर सवाल...

पत्रकार अमृतेश्वर सिंह की क़लम से :-
रायपुर: छत्तीसगढ़ में तारा कोल ब्लॉक की नीलामी और हसदेव अरण्य क्षेत्र में हो रही खनन गतिविधियों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने राज्य सरकार पर बड़ा हमला बोलते हुए तीखे सवाल किए हैं कि सरकार स्पष्ट करे तारा कोल ब्लॉक की नीलामी को आखिरकार कब रद्द किया जाएगा।
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार की नीतियां राज्य के प्राकृतिक संसाधनों और जंगलों को बचाने के बजाय उद्योगपतियों के हितों को साधने वाली हैं। पार्टी का कहना है कि इस पूरे मामले में जनता और आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
पर्यावरणीय और भौगोलिक नुकसान पर चिंता -
कांग्रेस नेताओं के अनुसार तारा कोल ब्लॉक लगभग पांच हजार एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें से बड़ा हिस्सा घने जंगलों से आच्छादित है। आशंका जताई जा रही है कि खनन कार्यों के कारण क्षेत्र के लाखों पेड़ों की कटाई हो सकती है, जिससे पर्यावरण संतुलन पर विपरीत असर पड़ेगा।
इसके साथ ही, लेमरू एलीफेंट रिजर्व के आसपास होने वाले खनन कार्यों से वन्यजीवों, विशेषकर हाथियों के पारंपरिक गलियारों और प्राकृतिक आवासों को भारी नुकसान पहुंचने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्तर पर जैव विविधता और जल स्रोतों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई है।
पिछली और वर्तमान सरकारों के फैसलों पर आमने-सामने -
विवाद के केंद्र में इस बात को लेकर भी बहस छिड़ गई है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में और वर्तमान प्रशासन के दौरान कोल ब्लॉकों को लेकर क्या पत्राचार किए गए थे। कांग्रेस का दावा है कि पिछली सरकार ने पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए कई ब्लॉकों को नीलामी प्रक्रिया से बाहर रखने की मांग की थी, जबकि मौजूदा सरकार के रुख पर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
आदिवासियों के हितों और स्थानीय विरोध का मुद्दा -
हसदेव अरण्य और आसपास के क्षेत्रों में खदानों के विस्तार को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदायों में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन जारी हैं। कई ग्राम सभाओं द्वारा इसके खिलाफ प्रस्ताव भी पारित किए गए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले इन क्षेत्रों में स्थानीय नागरिकों की सहमति के बिना लिए जा रहे निर्णय आदिवासियों की आजीविका और संस्कृति पर बड़ा संकट पैदा कर रहे हैं।






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