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बस्तर का अनोखा 'मुरिया दरबार': जानिए क्या है 600 साल पुरानी इस आदिवासी संसद का इतिहास...

52 minutes ago
2 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में हर साल होने वाला पारंपरिक आयोजन 'मुरिया दरबार' अपनी अनूठी कार्यशैली और प्राचीन संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र रहता है। इसे आदिवासियों की अपनी समानांतर संसद कहा जाता है, जहां आम जनता सीधे अपनी समस्याएं और शिकायतें रखती है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बस्तर प्रवास के दौरान इस ऐतिहासिक आयोजन में शामिल होने से इस परंपरा की महत्ता और अधिक बढ़ गई है।


क्या है मुरिया दरबार का इतिहास? इतिहासकारों के मुताबिक, इस अनूठी परंपरा की शुरुआत करीब छह शताब्दी पहले राजशाही काल में हुई थी। बस्तर के तत्कालीन शासक रियासत के दौरान आम जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए इस दरबार का आयोजन करते थे। इस सभा की सबसे बड़ी विशेषता यह होती थी कि राजा अपने शाही वस्त्र त्यागकर साधारण वेशभूषा में आते थे और ऊंचे सिंहासन पर बैठने के बजाय सीधे जमीन पर बैठकर लोगों की फरियाद सुनते थे। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को बिना किसी भय या झिझक के अपनी परेशानी साझा करने का खुला मंच देना था।


बस्तर दशहरे से है गहरा जुड़ाव यह आयोजन बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के समापन से जुड़ी मुख्य रस्मों का हिस्सा है। समय के साथ देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था आने और राजशाही समाप्त होने के बाद भी इस परंपरा के मूल स्वरूप और महत्व में कोई कमी नहीं आई। वर्तमान व्यवस्था में इस पारंपरिक दरबार में देश के सर्वोच्च पद पर आसीन राष्ट्रपति या राज्य के मुख्यमंत्री की विशेष उपस्थिति रहती है, साथ ही बस्तर राजपरिवार के वंशज भी इसमें सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।


कौन हैं मुरिया आदिवासी ? बस्तर संभाग के कोंडागांव, नारायणपुर, बीजापुर, जगदलपुर और दंतेवाड़ा जिलों में निवास करने वाली मुरिया जनजाति गोंड समुदाय की एक प्रमुख उपशाखा है। इसके अलावा इनकी कुछ आबादी ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में भी बसी हुई है। यह समुदाय अपनी प्राचीन युवा गृह संस्था 'घोटुल' प्रणाली और समृद्ध लोक संस्कृति के लिए विशेष पहचान रखता है। आज भी यह दरबार केवल एक रस्म नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों की अनूठी मिसाल है।

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