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दो केंद्रों से 228 टन सरकारी गेहूं गायब, 60 लाख के गबन की आशंका...

Sep 14
2 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-

लखनऊ :- उत्तर प्रदेश में सरकारी गेहूं खरीद से जुड़ी एक बड़ी कथित गड़बड़ी सामने आई है। दो गेहूं खरीद केंद्रों पर करीब 228 टन सरकारी गेहूं का हिसाब नहीं मिलने का मामला सामने आने के बाद संबंधित विभाग में हलचल मच गई है। गायब बताए जा रहे गेहूं की कीमत करीब 60 लाख रुपये आंकी गई है। मामला सामने आने के बाद खरीद केंद्रों के रिकॉर्ड, गेहूं की खरीद और उसके भंडारण तथा परिवहन से जुड़े दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण हो गई है।



















जानकारी के अनुसार, किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदे गए गेहूं को निर्धारित प्रक्रिया

के तहत सुरक्षित भंडारण केंद्र तक पहुंचाया जाना था। लेकिन रिकॉर्ड के मिलान के दौरान दो खरीद केंद्रों से खरीदे गए करीब 228 टन गेहूं का पूरा हिसाब नहीं मिलने की बात सामने आई। 60 लाख रुपये का गेहूं कहां गया? करीब 228 टन यानी 2.28 लाख किलोग्राम गेहूं का हिसाब न मिलना बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 60 लाख रुपये बताई जा रही है। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि गेहूं वास्तव में स्टॉक से गायब है या रिकॉर्ड, परिवहन और भंडारण से संबंधित दस्तावेजों में किसी तरह की गड़बड़ी हुई है।


इसी वजह से मामले को सीधे 'चोरी' या 'घोटाला' घोषित करने के बजाय जांच पूरी होने का इंतजार करना जरूरी है। स्टॉक रजिस्टर, खरीद रिकॉर्ड, किसानों को किए गए भुगतान और गोदाम तक भेजे गए गेहूं के दस्तावेजों के मिलान से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। दो खरीद केंद्र सवालों के घेरे में मामला दो सरकारी खरीद केंद्रों से जुड़ा बताया जा रहा है। इन केंद्रों पर किसानों से खरीदे गए गेहूं और उपलब्ध स्टॉक का मिलान किए जाने पर अंतर सामने आने का दावा है।


सरकारी खरीद व्यवस्था में किसानों से गेहूं लेने के बाद उसकी मात्रा का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। इसके बाद गेहूं को निर्धारित गोदाम या भंडारण केंद्र तक पहुंचाने की प्रक्रिया होती है। इसलिए किसी भी स्तर पर स्टॉक में बड़ा अंतर मिलने पर खरीद केंद्र से लेकर परिवहन और भंडारण तक पूरी श्रृंखला की जांच जरूरी हो जाती है। दस्तावेजों की जांच से खुलेगा राज अब सबसे बड़ा सवाल है कि करीब 228 टन गेहूं आखिर गया कहां।


जांच में यह देखा जाना जरूरी होगा कि संबंधित मात्रा का गेहूं वास्तव में खरीदा गया था या नहीं, अगर खरीदा गया तो उसे किस वाहन से कहां भेजा गया और संबंधित गोदाम में उसकी प्राप्ति दर्ज हुई या नहीं। इसके साथ खरीद केंद्रों के स्टॉक रजिस्टर, ऑनलाइन खरीद डेटा, परिवहन दस्तावेज और गोदाम की प्राप्ति से जुड़े रिकॉर्ड का मिलान भी अहम होगा। जिम्मेदारी तय होने का इंतजार इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी गेहूं का हिसाब न मिलने के कारण संबंधित कर्मचारियों और खरीद व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।


हालांकि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका के बारे में जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। अगर जांच में सरकारी गेहूं के वास्तविक नुकसान या जानबूझकर की गई हेराफेरी की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल करीब 60 लाख रुपये मूल्य के 228 टन गेहूं का हिसाब न मिलने का मामला जांच का विषय है और विस्तृत आधिकारिक रिपोर्ट से ही पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।

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