
""माईक्रो फाइनेंस कंपनियों के कर्मचारी लॉक डाउन में भी पैसा वसूल कर रहे हैं।""
""माईक्रो फाइनेंस कंपनियों के कर्मचारी लॉक डाउन में भी पैसा वसूल कर रहे हैं।""
बसना,,,,इन दिनों कोरोना वायरस महामारी के चलते पूरा देश भयभीत एवं सकते में है। ऐसे कई लोग हैं जिन्हें रोजी-रोटी के लाले पड़े हुए हैं ।माना कि 18 मई से व्यापार के लिए काफी रियायतें दे दी गई है। फिर भी क्या सब कुछ पूर्व की तरह सामान्य हो जाएगा ? बिल्कुल संभव नहीं है।
अब तो लॉक डाउन04 शुरू हो गया है। ऐसी परिस्थिति में वे लोग जो दिहाड़ी मजदूर, कामगार या मध्यम वर्गीय लोग जो समूह बनाकर विभिन्न माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से लोन लिए हुए हैं। सरकार ने आदेश किया है कि लॉक डाउन के दौरान किसी भी किस्म की ई .एम .आई (किस्त )नहीं पटानी है। फिर भी बावजूद इसके माइक्रो फाइनेंस कंपनियां महिला समूह को पैसे देने हेतु दबाव बना रही हैं। इन माइक्रो फाइनेंस के कर्मचारी समूह के सदस्यों को पुनः लोन देने का लालच देकर किश्त वसूल कर रहें है। कर्मचारियों का कहना है कि हमें ऊपर से आदेश है कि किश्त वसूलें या इस दौरान का कम से कम ब्याज वसूली करें।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भारत माइक्रो फाइनेंस के कर्मचारी इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में महिला समूह के सदस्यों को फोन पर अमुक अमुक दिवस को एक जगह इकट्ठा होने को कह रहे हैं। मीटिंग लेने की बात कह रहे हैं। समूह के सदस्यो को कह रहे हैं कि आप सभी लोग को ब्याज तो देना ही होगा ।अभी किश्त या ब्याज देने पर आपको फिर से लोन दे दिया जाएगा । सरकार के कड़े निर्देशों के बावजूद यह माइक्रो फाइनेंस कंपनियां नियम कानून को अंगूठा दिखा रहे है ।
आज शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के लोग इन माइक्रो फाइनेंस कंपनियों की गिरफ्त में बुरी तरह से फंसे हुए हैं। वे लोग जो एकमुश्त बड़ी रकम इकट्ठा नहीं कर पाते या अपनी कमाई से एक बड़ी रकम जमा नहीं कर पाते ऐसे ही लोग माइक्रोफाइनेंस में फंसे हुए हैं। क्योंकि उन्हें एक बड़ी रकम इन माइक्रोफाइनेंस कंपनी से समूह के रूप में हर सदस्य को मिल जाते हैं। जिससे वे अपनी उन जरूरतों को पूरा करते हैं जिसके लिए उन्हें बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है, और फिर सिलसिला शुरू हो जाता है सप्ताह, पाक्षिक, मासिक किस्तों का सिलसिला। ये उस नशेड़ी बाज़ की कहानी की तरह होती है जो हर दिन कसम खाता है कि आज के बाद मैं नशा नहीं करूंगा और दूसरे दिन फिर शुरू।
ठीक इसी तरह माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से जुड़े हुए लोग का हाल बन गया है ,हफ़्तों दर हफ्तों पैसा पटाने के बाद किश्त खत्म होते ही उनकी जरूरतें फिर सामने रहती है और फिर से रिसायकिल की तरह दोबारा कर्ज़ चालू हो जाता है। गांव में बसने वाले हो या शहरी क्षेत्र के लोग काफी संख्या में लोग माइक्रो फाइनेंस रूपी संक्रमण के गिरफ्त में है।उन्हें तो ये भी पता नही होता कि जो रकम उन्हें दी जा रही है, उस पर ब्याज कितना लिया जा रहा है।
ऐसे विषम परिस्थिति में वे लोग जो इन माइक्रोफाइनेंस के चुंगल में फंसे हुए हैं उन्हें इस जंजाल से उबरने में अच्छा-खासा वक्त लगेगा सम्हलने में बावजूद लाग डाउन खुलने के।
ज्यादातर वे लोग जो मध्यमवर्गीय श्रेणी में आते हैं या छोटे से मझोले कारोबारी है ऐसे लोग माइक्रोफाइनेंस की जाल में फंसे हुए हैं ऊपर से कोरोना काल में व्यापार पूरी तरह ठप हो गया है। मध्यमवर्गीय श्रेणी के लिए सरकार की तरफ से भी कोई खास राहत पैकेज भी नहीं रहा। राहत उन्हें मिली जो निम्न एवं उच्च श्रेणी या नौकरी पेशा लोगों में से आते हैं ।ऐसी स्थिति में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के कर्मियों द्वारा जोर-ज़बर से किश्त या ब्याज पटाने की बात कहना सरासर अन्याय होगा। संबंधित अधिकारी इस मसले पर विशेष ध्यान देवें।






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