आकांक्षा टोप्पो की गिरफ्तारी ने सोशल मीडिया की वाहवाही वाली राजनीति पर उठाए गंभीर सवाल.....

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-
कहा गए वो सभी गुरु, कहा गए आज वो सभी सपोर्टर जो सोशल मीडिया में लंबी-लंबी फेंक रहे रहे थे आकांक्षा टोप्पो को चना के झाड़ में चढ़ा रहे थे आज जब उसकी जरूरत थी तब कोई दिखे नहीं, मतलब सभी मिलकर के उसे बाली का बकरा बना दिए? आकांक्षा टोप्पो की गिरफ्तारी ने सोशल मीडिया की वाहवाही वाली राजनीति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
आज सोशल मीडिया पर आक्रामक अंदाज में अपनी पहचान बनाने वाली आकांक्षा टोप्पो की गिरफ्तारी हुई। न्यायालय में पेशी के बाद जमानत नहीं मिलने पर आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी कर उन्हें जेल दाखिल किया गया। घटना दुखद है, लेकिन इससे एक बड़ा सबक जरूर निकलता है, किसी के बहकावे, उकसावे और सोशल मीडिया की वाहवाही में आकर अपनी भाषा और व्यवहार की सीमाएं भूलना आखिरकार भारी पड़ सकता है।
आकांक्षा टोप्पो लंबे समय से सोशल मीडिया पर हर मुद्दे को बेबाक और आक्रामक अंदाज में उठाती रहीं। नेता हों, विधायक हों, सांसद हों, मंत्री हों या पत्रकार किसी को भी अपनी तीखी भाषा से नहीं बख्शती थीं। मुद्दा सही हो सकता था, सवाल जायज हो सकते थे, लेकिन भाषा, लहजा और गाली-गलौज अक्सर उनकी पहचान बन गया।
और सबसे बड़ा सवाल यही है कि उन्हें इस रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कौन करता रहा? कुछ लोग उनके वीडियो देखकर तालियां बजाते रहे, कमेंट करते रहे, उनकी आक्रामकता को बेबाकी बताते रहे और उन्हें लगातार और ज्यादा मुखर होने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। शायद यही लगातार मिलने वाली वाहवाही उन्हें यह भरोसा देती रही कि जो हो रहा है, सही हो रहा है। लेकिन आज जब मुश्किल की घड़ी आई तो वही तालियां कहां हैं? वही समर्थन कहां है? वही लोग कहां हैं, जो हर वीडियो पर हौसला बढ़ाते थे? सोशल मीडिया पर किसी को चढ़ाना बहुत आसान है। कमेंट में हिम्मत बढ़ाना बहुत आसान है। दूसरे को लड़ने के लिए उकसाना उससे भी आसान है।
लेकिन जब उसी लड़ाई का परिणाम सामने आता है, तब साथ खड़ा होना सबसे मुश्किल काम बन जाता है। यही कारण है कि जिंदगी में किसी की वाहवाही को अपनी ताकत समझने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। क्योंकि मुसीबत में कमेंट करने वाले नहीं, साथ खड़े होने वाले काम आते हैं। आज आकांक्षा के मामले से हर सोशल मीडिया एक्टिविस्ट को सीख लेने की जरूरत है, आक्रामकता को साहस समझना भूल है, गाली-गलौज को बेबाकी समझना उससे बड़ी भूल और दूसरों की वाहवाही को अपनी ताकत समझना सबसे बड़ी भूल।
दूसरों के इशारे पर अपनी जुबान और अपने कदम मत चलाइए। जो भी करना है, अपनी जिम्मेदारी और अपने विवेक से कीजिए। क्योंकि पब्लिक पहले चना के झाड़ पर चढ़ाती है, खूब तारीफ करती है, हौसला बढ़ाती है….... और जब नीचे गिरने की बारी आती है तो अक्सर दूर खड़ी होकर तमाशा देखती है। सीख साफ है, तालियां बजाने वाली भीड़ बहुत मिलेगी, लेकिन मुश्किल में कंधा देने वाले गिने-चुने ही होंगे। इसलिए भीड़ की आवाज पर नहीं, अपने विवेक की आवाज पर चलिए।
शालिनी न्यूज़ एजेंसी संवाददाता राकेश कुमार साहू जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़।






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