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सुप्रीम कोर्ट ने की राज्यपालों को लेकर टिप्पणी...

Nov 24, 2023
3 min read





































ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-

दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘लोकतंत्र के संसदीय स्वरूप में वास्तविक शक्ति जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों में निहित होती है, जो राज्यों और केंद्र दोनों में सरकारों में राज्य विधानमंडल और संसद के सदस्य शामिल होते हैं।’ शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए कहा है कि राज्यपाल राज्य के निर्वाचित प्रमुख नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्य के नाममात्र के प्रमुख हैं। शीर्ष अदालत ने कहा है कि कैबिनेट स्वरूप में सरकार के सदस्य विधायिका के प्रति जवाबदेह होते हैं। उनकी जांच के अधीन होते हैं।


मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की पीठ कहा है कि ‘राज्य के एक अनिर्वाचित प्रमुख के रूप में राज्यपाल को कुछ संवैधानिक शक्तियां सौंपी गई हैं, लेकिन इन शक्तियों का इस्तेमाल राज्य विधानसभाओं द्वारा कानून बनाने की सामान्य प्रक्रिया को विफल करने के लिए नहीं किया जा सकता है।


पीठ ने साफ किया कि राज्यपाल विधेयक को मंजूरी रोककर विधानमंडल को वीटो नहीं कर सकते और मंजूरी देने से इनकार करने पर विधेयक को विधानसभा को वापस लौटाना होगा। पीठ ने पंजाब सरकार की याचिका पर यह फैसला दिया है। याचिका में राज्यपाल पर विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी नहीं देने का आरोप लगाया गया था। पीठ ने 10 नवंबर को ही इस मामले में फैसला दिया था, लेकिन फैसले की प्रति अब मुहैया कराई गई है।


फैसले में कहा गया है कि ‘राज्य के एक अनिर्वाचित प्रमुख के रूप में राज्यपाल को कुछ संवैधानिक शक्तियां सौंपी गई हैं। हालांकि, राज्यपाल इन शक्तियों का इस्तेमाल विधानसभा कानून बनाने की सामान्य प्रक्रिया को विफल करने के लिए नहीं कर सकते।’ शीर्ष अदालत ने कहा है कि ‘यदि राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 200 के मूल भाग के तहत विधेयक पर सहमति नहीं देने का निर्णय लेते हैं, तो कार्रवाई का तार्किक तरीका विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानमंडल को भेजने से पहले प्रावधान में बताए समुचित प्रक्रिया के साथ आगे बढ़ाना होगा।


दूसरे शब्दों में कहें तो, अनुच्छेद 200 के मूल भाग के तहत सहमति रोकने की शक्ति को पहले प्रावधान के तहत राज्यपाल द्वारा अपनाई जाने वाली कार्रवाई के परिणामी पाठ्यक्रम के साथ पढ़ा जाना चाहिए। यदि अनुच्छेद 200 के मूल भाग द्वारा प्रदत्त सहमति को रोकने की शक्ति के साथ पहले प्रावधान को नहीं पढ़ा जाता है, तो राज्यपाल, राज्य के अनिर्वाचित प्रमुख के रूप में, विधायिका के विधायी दायरे के कामकाज को वस्तुतः वीटो करने की स्थिति में होंगे।


शीर्ष अदालत ने कहा है कि इस तरह की कार्रवाई शासन के संसदीय प्रणाली पर आधारित संवैधानिक लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। पीठ ने कहा है कि इसलिए, जब राज्यपाल अनुच्छेद 200 के मूल भाग के तहत सहमति को रोकने का निर्णय लेते हैं, तो कार्रवाई का तरीका क्या होना चाहिए पहले प्रावधान में जो संकेत दिया गया है, उसका पालन किया जाता है। राज्यपाल, संवैधानिक प्रावधानों के तहत, विधायिका का एक हिस्सा है और संवैधानिक शासन से बंधा हुआ है।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘जहां तक धन विधेयक का सवाल है, पहले किसी विधेयक को वापस करने की राज्यपाल की शक्ति को राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति के दायरे से बाहर रखा गया है। धन विधेयक अनुच्छेद 207 द्वारा शासित होते हैं, जिसके संदर्भ में सिफारिश की जाती है और अनुच्छेद 199 के खंड (1) के खंड (ए) से (एफ) में निर्दिष्ट मामले पर विधेयक पेश करने के लिए राज्यपाल की आवश्यकता आवश्यक है।

 
 
 

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