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सोशल मीडिया वाला इश्क और मंदिर के फेरे: शादी रद्द कराने की याचिका पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला...

5 days ago
2 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:-

बिलासपुर में सोशल मीडिया के जरिए शुरू हुई प्रेम कहानी और मंदिर में हुई शादी से जुड़ा एक दिलचस्प मामला सामने आया है। हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें मंदिर में सात फेरे न होने का हवाला देकर विवाह को अवैध घोषित करने की मांग की गई थी। अदालत का साफ कहना है कि केवल रस्मों को लेकर विवाद होने पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत किसी रिश्ते को शून्य घोषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके आधार कानून में बेहद सीमित हैं। इस मामले में जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत यानी फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है, हालांकि पति की मुख्य याचिका भी खारिज कर दी गई है।


यह पूरा मामला जांजगीर-चांपा जिले के रहौद इलाके का है, जहां एक युवक और युवती की जान-पहचान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और बात शादी तक पहुंच गई। युवक का पक्ष था कि उसने परिवार की रजामंदी लेने की बात कही थी, लेकिन फरवरी 2022 में युवती पक्ष ने उसे घर बुलाकर दबाव बनाया और फर्जी केस में फंसाने की धमकी देकर दस्तावेजों पर साइन करवा लिए। इसके बाद चिरमिरी के एक शिव मंदिर में जल्दबाजी में रस्में पूरी कराई गईं। युवक की मुख्य दलील यह थी कि शादी के दौरान अग्नि के सामने सात फेरे यानी सप्तपदी की रस्म नहीं निभाई गई थी, इसलिए इस बंधन को कानूनी तौर पर खत्म किया जाए। इसके लिए उसने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।


दूसरी तरफ, युवती ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि विवाह पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाज के साथ संपन्न हुआ था। उसके मुताबिक, शादी के बाद दोनों करीब डेढ़ महीने तक पति-पत्नी की तरह साथ भी रहे। युवती का यह भी आरोप था कि यह पूरा मुकदमा सिर्फ इसलिए दायर किया गया ताकि युवक कानूनी रूप से भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच सके।


हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि फैमिली कोर्ट ने आवेदन की कानूनी स्वीकार्यता पर गौर किए बिना सीधे रस्मों और वैधता के बिंदु पर फैसला दे दिया था। अदालत के अनुसार, धारा 11 के तहत यह परखना जरूरी होता है कि विवाह में अधिनियम की धारा 5 की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन हुआ है या नहीं। कानूनी प्रक्रिया में हुई इस चूक की वजह से हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें शादी को वैध करार दिया गया था। हालांकि, इस तकनीकी सुधार से युवक को अपनी शादी रद्द करवाने की राहत नहीं मिल सकी, क्योंकि अदालत ने माना कि उसकी मुख्य याचिका सुनवाई के लायक ही नहीं थी।

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