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कलियुग के 'श्रवण कुमार': वैशाली में मां और नानी को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा पर निकले दो युवक.....

Aug 17
3 min read

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:- 

वैशाली माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा को भारतीय संस्कृति में सबसे बड़ा धर्म माना गया है। इसी भावना को बिहार के वैशाली जिले के दो युवकों ने अपनी अनोखी पहल से साकार कर दिखाया है। जंदाहा और महुआ क्षेत्र के रहने वाले दो बेटों ने अपनी मां और नानी को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा शुरू की है। उनका यह अनोखा सफर लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। दक्षिण-एशियाई और प्रवासी दोनों युवकों की श्रद्धा और मातृभक्ति देखकर लोगों को त्रेता युग के श्रवण कुमार की याद आ गई। जिस तरह श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी, उसी तरह इन दोनों युवकों ने भी अपने बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सेवा भाव का उदाहरण पेश किया है।जंदाहा थाना क्षेत्र के बहसी गांव निवासी दीपक कुमार अपनी मां को कांवड़ में बैठाकर यात्रा पर निकले हैं। दीपक अपनी मां को लेकर बाबा बटेश्वर नाथ मंदिर, जंदाहा के पानापुर में दर्शन कराने के लिए जा रहे हैं। दीपक का कहना है कि मां की सेवा और उनकी इच्छा पूरी करना उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। उन्होंने बताया कि माता-पिता का आशीर्वाद जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होती है और उनकी सेवा करना हर संतान का कर्तव्य है।


वहीं, महुआ प्रखंड के मिर्जानगर गांव निवासी रंजीत कुमार भी अपनी नानी सुदमीया देवी को कांवड़ में बैठाकर बाबा बटेश्वर नाथ मंदिर के दर्शन के लिए निकले हैं। रंजीत का यह प्रयास भी लोगों के लिए प्रेरणा बन गया है। यात्रा के दौरान जब लोगों ने दोनों युवकों को अपने बुजुर्गों को कांवड़ में बैठाकर जाते देखा तो वे भावुक हो उठे। कई लोगों ने इसे आज के समय में संस्कार और पारिवारिक मूल्यों का जीवंत उदाहरण बताया। स्थानीय लोगों का कहना है कि आधुनिक दौर में जहां कई बार बुजुर्गों की अनदेखी की खबरें सामने आती हैं, वहीं दीपक और रंजीत जैसे युवाओं ने यह संदेश दिया है कि माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए। बाबा बटेश्वर नाथ मंदिर क्षेत्र में सावन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भगवान शिव की आराधना के लिए कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा भी काफी पुरानी है। लेकिन अपनी मां और नानी को कांवड़ में बैठाकर यात्रा करना इस यात्रा को विशेष बना देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन महीने में भगवान शिव की पूजा और जलाभिषेक का विशेष महत्व होता है। भक्त दूर-दूर से कांवड़ यात्रा कर शिव मंदिरों में जल अर्पित करते हैं। इस दौरान कई श्रद्धालु कठिन रास्तों और लंबी दूरी की यात्रा पूरी करते हैं।


दीपक और रंजीत ने भी श्रद्धा और सेवा भाव के साथ यह यात्रा शुरू की है। उनके लिए यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि अपनी मां और नानी के प्रति सम्मान और प्रेम व्यक्त करने का माध्यम भी है। लोगों का कहना है कि बुजुर्गों की सेवा से बड़ा कोई पुण्य नहीं है। इन दोनों युवकों ने अपने कार्य से समाज को यह संदेश दिया है कि परिवार के बड़े सदस्यों की देखभाल और उनकी इच्छाओं का सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है। यात्रा के दौरान रास्ते में कई लोग दोनों युवकों का हौसला बढ़ा रहे हैं। कुछ लोग उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं। लोग इसे भारतीय संस्कृति और पारिवारिक संस्कारों की मिसाल बता रहे हैं। दक्षिण-एशियाई और प्रवासी दीपक और रंजीत की इस यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि आज भी समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो अपने बुजुर्गों को सम्मान और प्रेम देने को सबसे बड़ी प्राथमिकता मानते हैं। उनके इस प्रयास की तुलना लोग श्रवण कुमार से कर रहे हैं। हालांकि समय और परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन भावना वही है—अपने माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति समर्पण और सेवा। दोनों युवकों की यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश है। उन्होंने दिखाया है कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी संस्कार और परिवार के प्रति जिम्मेदारी को महत्व दिया जा सकता है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि दीपक और रंजीत की यह पहल युवाओं को अपने माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सेवा की भावना अपनाने के लिए प्रेरित करेगी।



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