स्मृतियांँ ही शेष रह जाएंगी | दिलशाद सैफी की कलम से |
स्मृतियांँ ही शेष रह जाएंगी |
दिलशाद सैफी की कलम से |
रायपुर छत्तीसगढ़

जब ढ़लनें लगेगीं उम्र
तब तुम बढ़ने लगोगे शनैः शनैः
मृत्यु की ओर....,,,
दरकनें लगेंगीं जिस्म की
भित्तियां भी
और टूटने लगेगी सांसें...,,,
वैसे ही जैसे
सरकती है धरती....,,,
और उठती हुई
ये सागर की तेज लहरें
लील लेती है
जाने कितनी ही सभ्यता...,,,
सरकती है तिथियां
बदलते है अपना स्थान
सुर्य, चन्द्रमा और
फिर बदल जाती है शताब्दीयां...,,,
रिक्त होने लगते हो तुम
वैसे ही जैसे
अनाज की कोठियों को चूहे
कुतर-कुतर के
धीरे से कर देते है खाली...,,,
ढ़हनें लगता है
वैभव,प्रतिष्ठा का महल और
उसमें बिछि हुई
मखमली कालीनो को जैसे
दिमक चट कर गया हो ...,,,
ओहदें और पद के लिए बनी
शानदार तख्तियां....,,,
जिस प्रगति के पथ पर मान
सम्मान के कलाप
गुंजते थे कभी अब वहां पर
शोर करती है
दमदार शख्स की पदचापे...,,,
तुम्हें ये बताने
कि देखो सब बदल रहा है
तुम जिस जगह थे
वहां पर आज कोई और है...,,,
तुम्हारे ह्रदय में
उठता हुआ सन्नाटा प्रलय सा होगा
और उस क्षण पे
देह से लिपटी आत्मा निकलने को
छटपटाएंगी
ठीक वैसे ही जैसे जाल में फंसीं
मछली छटपटातीं है...,,,
और फिर अंत में एक गहरी सी
ठंडी सांस के साथ
सब कुछ विलीन हो जाएगा...,,,
तुम्हारी स्मृतियांँ ही
बस शेष हां शेष रह जाएंगी...,,,
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