जवानी में नहीं की कदर, आज 50 की उम्र में अकेले बैठकर रोता हूँ... एक पति की दर्द भरी दास्तान....

ब्रेकिंग ADN न्यूज़:- आज मेरी उम्र 50 साल हो गई है। शरीर में ताकत नहीं रही, आँखों से ठीक से दिखाई नहीं देता, हाथ-पैर काँपते हैं और दिल में इतने पछतावे भरे हैं कि कभी-कभी खुद से ही नजरें नहीं मिला पाता। आज मैं अपनी जिंदगी की एक ऐसी सच्चाई बताने जा रहा हूँ, जिसे सुनकर शायद किसी दूसरे आदमी की आँखें खुल जाएँ। जब मैं जवान था, तब मेरा कपड़ों का बहुत अच्छा कारोबार था। दुकान चलती थी, खूब पैसा कमाता था, घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। मेरी शादी हुई, मेरी बीवी बहुत सीधी-सादी और समझदार थी। वह मुझे दिल से चाहती थी, मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखती थी। सुबह उठकर मेरे लिए खाना बनाती, मेरी पसंद के पकवान बनाती, मेरे कपड़े तैयार रखती और शाम को मेरे घर लौटने का इंतजार करती। कभी मैं देर से घर आता, तो वह दरवाजे पर बैठी रहती। मुझे देखते ही पूछती, “खाना लगा दूं? आप थक गए होंगे, पहले आराम कर लीजिए।” लेकिन उस वक्त मुझे उसकी मोहब्बत की कोई कदर ही नहीं थी।
मैं दोस्तों के साथ बैठना पसंद करता था। माँ-बाप जो कहते, वही मेरे लिए सही होता था। मेरी बहनें मेरी बीवी के बारे में कुछ भी कह देतीं, तो मैं बिना सच्चाई जाने अपनी बीवी को ही डाँट देता था। मुझे लगता था कि मेरे अपने तो मेरे माँ-बाप, भाई-बहन हैं, बीवी तो बाहर से आई हुई औरत है। वह मेरे घर में रह रही है, मेरे बच्चों को जन्म दे रही है, मेरा घर संभाल रही है, तो यह उसका फर्ज है। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि वह भी अपना घर, अपने माँ-बाप और अपना बचपन छोड़कर मेरे भरोसे आई है। मेरे दो बच्चे हुए, एक बेटा और एक बेटी। दोनों को मेरी बीवी ने अपने दम पर पाला। बच्चों की तबीयत खराब हो, रात भर जागना हो, घर में कोई मेहमान आ जाए या कोई त्यौहार हो, हर जिम्मेदारी उसी के सिर पर रहती थी। लेकिन मैं क्या करता था? दोस्तों के साथ बैठकर हँसता था, अपने कारोबार का घमंड करता था और घर आकर अपनी बीवी में कमियाँ निकालता था।
वह मेरे पास बैठकर दो प्यार की बातें करना चाहती, तो मैं कह देता, “सारा दिन घर में रहती हो, अब क्या बातें करनी हैं? मुझे परेशान मत करो।” कभी वह मेरे लिए सज-सँवरकर बैठती, तो मैं उसकी तरफ देखता तक नहीं था। वह मेरी पसंद का खाना बनाकर लाती, तो मैं दोस्तों के साथ बाहर खाकर आ जाता। उसकी आँखों में मेरे लिए इंतजार होता था, लेकिन मेरी आँखों में उसके लिए कोई जगह नहीं थी। मेरे घर के लोगों को भी मेरी बीवी से ज्यादा मेरे पैसों से मतलब था। जब तक मैं कमाता रहा, सब मेरे आसपास घूमते रहे। कोई मेरी तारीफ करता, कोई मेरे कारोबार की तारीफ करता, कोई मुझसे अपने काम करवाता। मुझे लगता था कि मैं बहुत किस्मत वाला आदमी हूँ, मेरे पास पैसा है, परिवार है, इज्जत है और मुझे किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
एक दिन मेरे कारोबार में ऐसा घाटा हुआ कि मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। पहले थोड़ा नुकसान हुआ, फिर और नुकसान होने लगा। दुकान का माल बिकने लगा, उधार बढ़ता गया और जिन लोगों को मैं अपना पक्का साथी समझता था, वे धीरे-धीरे मुझसे दूर होने लगे। उसी बीच मेरी तबीयत भी बिगड़ने लगी। शरीर कमजोर होने लगा, दवाइयों का खर्च बढ़ गया और कारोबार संभालना मुश्किल हो गया। मैंने सोचा, चलो कोई बात नहीं, माँ-बाप हैं, भाई हैं, बहनें हैं, इतने साल जिनके लिए मैंने सब कुछ किया, वे मेरा साथ देंगे। लेकिन जब मेरी जेब खाली होने लगी, तो लोगों के व्यवहार भी बदलने लगे। जो भाई पहले मेरे साथ बैठकर खाना खाता था, वह मेरी परेशानियाँ सुनकर बहाने बनाने लगा। जो बहनें मेरे आगे-पीछे घूमती थीं, उन्हें मेरी जरूरतों से परेशानी होने लगी। माँ-बाप भी अपनी मजबूरियाँ गिनाने लगे। तब पहली बार समझ आया कि जब तक मेरे पास पैसा था, तब तक मेरी बात की कीमत थी। आज पैसा नहीं रहा, तो मेरी बात सुनने वाला भी कोई नहीं था।
उस वक्त मेरी बीवी ने मेरा साथ नहीं छोड़ा। उसने मेरे लिए दवाइयाँ जुटाईं, मेरे खाने-पीने का ख्याल रखा और बच्चों को संभालते हुए मुझे हिम्मत देती रही। मैंने पहली बार उसकी आँखों में डर देखा। वह डरती थी कि कहीं मैं उसे छोड़कर दुनिया से न चला जाऊँ। वह खुद परेशान थी, लेकिन मेरे सामने हिम्मत बनकर खड़ी रहती थी। एक दिन मैंने उससे पूछा, “तुम मेरे लिए इतना सब क्यों कर रही हो? मैंने तो जिंदगी भर तुम्हें कुछ दिया ही नहीं।” वह चुप रही। फिर बोली, “आप मेरे पति हैं। जिंदगी में सुख आए या दुख, मैंने आपके साथ रहने का वादा किया था। मैं अपना फर्ज निभा रही हूँ।” उसकी बात सुनकर मेरा सिर शर्म से झुक गया। जिस औरत को मैं जिंदगी भर पराया समझता रहा, वही मेरे बुरे वक्त में मेरी अपनी निकली। लेकिन शायद मैंने बहुत देर कर दी थी।
कुछ समय बाद मेरी बीवी भी इस दुनिया से चली गई। उसके जाने के बाद घर में सब कुछ था, लेकिन घर जैसा कुछ नहीं रहा। उसकी आवाज नहीं थी, दरवाजे पर मेरा इंतजार करने वाला कोई नहीं था, मेरे पसंद का खाना बनाने वाला कोई नहीं था। बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह मेरे ऊपर आ गई और मेरा कारोबार पहले ही खत्म हो चुका था। मैंने अपनी दुकान बेच दी। धीरे-धीरे जमा पूँजी भी खत्म हो गई। जिस आदमी को कभी अपने पैसों पर इतना घमंड था, उसे पेट पालने के लिए मजदूरी करनी पड़ी। जिन हाथों से कभी कपड़ों के बड़े-बड़े सौदे किए थे, उन्हीं हाथों से दूसरों का सामान उठाना पड़ा। मुझे अपने काम से शर्म नहीं आती थी, शर्म इस बात की आती थी कि जब मेरे पास सब कुछ था, तब मैंने अपनी बीवी को इज्जत नहीं दी। आज जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब मुझे उसी इज्जत और अपनापन की कीमत समझ आई।
मेरे बच्चे बड़े होने लगे। वे अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए। मैं उन्हें दोष नहीं देता। मैंने खुद अपनी बीवी के साथ कैसा व्यवहार किया था, बच्चों ने सब देखा था। मैंने उन्हें कभी यह सिखाया ही नहीं कि घर में औरत की इज्जत कैसे की जाती है, पति-पत्नी एक-दूसरे का सहारा कैसे बनते हैं। आज मेरे पास अपनी गलतियों के अलावा कुछ नहीं बचा है। कभी-कभी रात को नींद नहीं आती। मैं अपनी बीवी को याद करता हूँ। याद आता है कि कैसे वह मेरे लिए दरवाजे पर बैठी रहती थी। कैसे मेरी एक मुस्कान के लिए तरह-तरह के पकवान बनाती थी। कैसे मेरे गुस्से को चुपचाप सह लेती थी। कैसे मेरी बहनों के ताने सुनकर भी मेरे परिवार को जोड़कर रखने की कोशिश करती थी। काश, उस वक्त मैंने उसे अपने पास बैठाकर पूछा होता, “तुम्हारा मन कैसा है? तुम खुश तो हो ना? तुम्हें किसी बात का दुख तो नहीं?” काश, मैंने कभी दोस्तों की महफिल छोड़कर उसके साथ दो पल बैठना सीख लिया होता। काश, मैंने माँ-बाप और बहनों की हर बात को सच मानने के बजाय अपनी बीवी की बात भी सुनी होती। काश, मैंने उसे पराया समझने के बजाय अपना सबसे करीबी साथी समझा होता।
आज मैं 50 साल का बूढ़ा आदमी अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती मानता हूँ। पैसा कमाना गलत नहीं था, परिवार से प्यार करना भी गलत नहीं था। गलती यह थी कि मैंने अपने परिवार के नाम पर अपनी ही पत्नी को अकेला कर दिया। मैंने यह नहीं समझा कि माँ-बाप अपनी जगह हैं, भाई-बहन अपनी जगह हैं, लेकिन पत्नी वह साथी है जिसके साथ मिलकर जिंदगी बिताने का वादा किया जाता है। मैं आज हर उस आदमी से हाथ जोड़कर कहना चाहता हूँ, जिसकी शादी हो चुकी है और जो अपनी बीवी को घर की नौकरानी या अपने परिवार की जिम्मेदारी समझता है। भाई, वक्त रहते अपनी बीवी की कदर कर लेना। वह भी इंसान है, उसे भी प्यार चाहिए, सम्मान चाहिए, दो मीठे बोल चाहिए। वह दिन भर तुम्हारे लिए काम करती है, तुम्हारे बच्चों को पालती है, तुम्हारे घर को अपना घर बनाती है। उसकी खामोशी को उसकी कमजोरी मत समझना। हो सकता है वह इसलिए चुप हो क्योंकि वह तुम्हारा घर टूटने नहीं देना चाहती। अपने माँ-बाप की इज्जत करो, बहन-भाइयों से प्यार करो, लेकिन उनके प्यार में इतने अंधे मत हो जाना कि अपनी पत्नी का दर्द ही दिखाई देना बंद हो जाए। किसी की बात सुनकर अपनी बीवी को मत डाँटो।
पहले उसकी बात सुनो, उसे समझो और फिर फैसला करो। और सबसे जरूरी बात, अपनी पत्नी की कदर सिर्फ तब मत करना जब तुम बीमार पड़ जाओ, तुम्हारा कारोबार डूब जाए या दुनिया तुम्हारा साथ छोड़ दे। उसकी कदर तब भी करना जब तुम्हारे पास पैसा हो, ताकत हो और तुम्हारे पीछे सैकड़ों लोग खड़े हों। क्योंकि बुरे वक्त में साथ देने वाले लोग बहुत कम होते हैं, लेकिन जो इंसान तुम्हारे साथ जिंदगी बनाने के लिए अपना सब कुछ छोड़कर आया है, उसकी भावनाओं की कदर करना तुम्हारी रोज की जिम्मेदारी है। आज मेरी जिंदगी ढल चुकी है। मैं अपनी बीवी को वापस नहीं ला सकता, उससे माफी नहीं माँग सकता और न ही अपने बीते हुए साल बदल सकता हूँ। बस यही दुआ करता हूँ कि मेरी कहानी सुनकर किसी दूसरे आदमी का घर बर्बाद होने से बच जाए। याद रखना, जब जवानी में पत्नी की आँखों में तुम्हारे लिए इंतजार होता है, तब उसकी कदर कर लेना। बुढ़ापे में उसी इंतजार की यादें रह जाती हैं और उन्हें सीने से लगाकर रोने के सिवा कुछ नहीं बचता।






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