आर्थिक तंगी को मात देकर मिसाल बनीं सारंगढ़ की गीता, 'बिहान' योजना ने संवारी तकदीर.....

पत्रकार अमृतेश्वर सिंह की क़लम से:-
रायपुर, छत्तीसगढ़ शासन की ओर से चलाई जा रही ग्रामीण उत्थान की योजनाएं किस तरह महिलाओं की जिंदगी में क्रांतिकारी बदलाव ला रही हैं, इसकी बानगी सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के सारंगढ़ ब्लॉक स्थित जेवरा गांव में साफ देखी जा सकती है। यहां की निवासी गीता मिरी ने अपनी मेहनत और सरकारी मदद के बूते सफलता की एक नई इबारत लिख दी है। कभी आर्थिक तंगियों के साये में जीने वाली गीता आज इलाके की महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का पर्याय बन चुकी हैं।

बिहान योजना से मिली रफ्तार, 50 हजार की पूंजी ने बदली तस्वीर -
एक वक्त था जब गीता के पास आय का कोई सुनिश्चित जरिया नहीं था, जिससे परिवार का गुजर-बसर करना भी चुनौती भरा था। हालांकि, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन 'बिहान' से जुड़ने के बाद उनके जीवन का चक्र पूरी तरह पलट गया। स्व-सहायता समूह के जरिए उन्हें व्यवसाय शुरू करने के लिए 50,000 रुपये का ऋण मिला। इस राशि का सही उपयोग करते हुए उन्होंने अपनी 80 डिसमिल जमीन को ही अपनी तरक्की का जरिया बनाने की ठान ली।
सब्जी की खेती से हर दिन हो रही मोटी कमाई -
गीता ने अपनी जमीन पर आधुनिक तरीकों से टमाटर, करेला और खीरे की बंपर पैदावार शुरू की। उनकी लगन का ही नतीजा रहा कि खेत से निकलने वाली हरी सब्जियों ने स्थानीय बाजार में धूम मचा दी। वर्तमान में उन्हें रोजाना 3,000 से 4,000 रुपये तक की ठोस आमदनी हो रही है। अब तक वे सब्जियों की बिक्री से लगभग 2 लाख रुपये कमा चुकी हैं, जिसमें से महज एक ही फसल चक्र में उन्हें करीब 60,000 रुपये का शुद्ध मुनाफा हाथ लगा है।

पशुपालन ने बढ़ाया मुनाफे का दायरा -
खेती-किसानी के साथ-साथ गीता ने अपनी आय को और अधिक सुरक्षित करने के लिए बकरी पालन का काम भी शुरू किया। यह फैसला उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ और इससे उन्हें सालाना लगभग 50,000 रुपये की अतिरिक्त आय होने लगी। खेती और पशुपालन के इस बेहतरीन तालमेल ने उनके परिवार की माली हालत को बेहद मजबूत कर दिया है।
दूसरों के लिए प्रेरणा बन रही हैं गीता -
अपनी सफलता की दास्तान बयां करते हुए गीता बताती हैं कि 'बिहान' योजना और स्व-सहायता समूह से जुड़े मंच ने उन्हें न सिर्फ आर्थिक संबल दिया, बल्कि समाज में एक नई पहचान भी दिलाई। आज वे अपने परिवार का मजबूत सहारा बन चुकी हैं। जेवरा गांव की यह कर्मठ महिला आज इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि पक्का इरादा और सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो ग्रामीण महिलाएं भी अपनी तकदीर खुद लिख सकती हैं।






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