छत्तीसगढ़ में धान की खेती के सटीक आकलन के लिए एमओयू, उपार्जन व्यवस्था होगी और पारदर्शी...

पत्रकार अमृतेश्वर सिंह की क़लम से :-
रायपुर, छत्तीसगढ़ में धान की खेती के क्षेत्रफल का सटीक, पारदर्शी और तकनीक-आधारित आकलन करने के लिए राज्य शासन ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मंत्रालय महानदी भवन में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय और छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के बीच एक अहम समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य सेटेलाइट-आधारित मैपिंग, डिजिटल क्रॉप सर्वे और भू-स्थानिक डेटा के समन्वय से राज्य की धान उपार्जन व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाना है।
गैर-जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों की मैपिंग: वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत आबंटित भू-भागों और डुबान क्षेत्रों में स्थित कृषि भूमियों की पहचान कर उनकी GIS आधारित पॉलीगॉन लेयर तैयार की जाएगी, जो वर्तमान में डिजिटल रूप से मैप नहीं हैं।
खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए आकलन: तैयार पॉलीगॉन लेयर और भू-स्थानिक डेटा के आधार पर आगामी खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 में धान की फसल के वास्तविक रकबे का सटीक आकलन किया जाएगा।
सेटेलाइट इमेजरी से सत्यापन: अन्य जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों में भूमि खंडों (खसरों) के अक्षांश-देशांतर का सेटेलाइट इमेजरी से मिलान कर धान की फसल की डिजिटल उपस्थिति की पुष्टि की जाएगी।

इस तकनीकी पहल से दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों की कृषि भूमि की डिजिटल पहचान मजबूत होगी और डिजिटल क्रॉप सर्वे के लिए एक ठोस आधार तैयार होगा।
समझौता ज्ञापन के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले, खाद्य विभाग की संचालक फरिहा आलम और छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के संचालक कवीश्वर उपस्थित रहे।






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