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बिहार की लोकसंस्कृति: मिथिला का पारंपरिक झिझिया नृत्य और इसका सांस्कृतिक महत्व....

2 hours ago
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ब्रेकिंग ADN न्यूज़:- बिहार:- लोकसंस्कृति में झिझिया नृत्य की अपनी खास पहचान है। विशेष रूप से मिथिला क्षेत्र में प्रचलित यह नृत्य शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा से जुड़ा है। इसमें महिलाएँ समूह बनाकर लोकगीत गाती हैं और सिर पर छिद्र वाला मिट्टी का घड़ा रखकर नृत्य करती हैं। घड़े के भीतर दीपक जलता रहता है, जिसकी रोशनी छिद्रों से बाहर दिखाई देती है। यही दृश्य झिझिया को अलग पहचान देता है। बिहार में झिझिया के अलावा बिदेसिया, जट-जटिन और अन्य लोकनृत्य भी प्रचलित हैं, इसलिए इसे प्रदेश का एकमात्र “असली” लोकनृत्य कहना उचित नहीं होगा।


झिझिया की प्रस्तुति में सिर पर घड़ा सँभालते हुए गीत की लय पर कदम बढ़ाए जाते हैं। समूह में तालमेल और शरीर का संतुलन इस कला के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। घड़े के अंदर जलता दीपक और उसके छिद्रों से निकलती रोशनी नृत्य को आकर्षक बनाती है। महिलाएँ देवी भक्ति से जुड़े गीत गाते हुए इस परंपरा में भाग लेती हैं। यह केवल मंच पर होने वाला कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक आयोजन का भी हिस्सा रहा है। इस नृत्य से बुरी नजर और अनिष्ट से बचाव की लोकमान्यताएँ भी जुड़ी हैं। परंपरागत कथाओं और गीतों में देवी भगवती तथा ब्रह्म बाबा से रक्षा की प्रार्थना का उल्लेख मिलता है। कुछ कथाओं में “डायन” की नजर से बचने की मान्यता बताई जाती है। यह लोकविश्वास है; किसी महिला के पास ऐसी अलौकिक शक्ति होने या नृत्य से उससे बचाव होने का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। किसी व्यक्ति को “डायन” कहना इन सांस्कृतिक कथाओं के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।


आज झिझिया की प्रस्तुतियों में नई पीढ़ी भी भाग ले रही है। नवरात्र के आयोजनों और पूजा पंडालों में बच्चे पारंपरिक परिधान पहनकर लोकगीतों पर यह नृत्य प्रस्तुत कर रहे हैं। सिर पर घड़ा और भीतर दीपक वाली शैली के माध्यम से वे स्थानीय कला से परिचित हो रहे हैं। हाल की प्रस्तुतियों में मैथिली गीतों के साथ बच्चों की टोलियों की भागीदारी भी सामने आई है। ऑर्केस्ट्रा एक मंचीय संगीत प्रस्तुति हो सकती है, जबकि झिझिया की पहचान उसकी विशिष्ट नृत्य शैली, लोकगीत और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से बनती है। झिझिया को समझने के लिए उसके साथ जुड़े सामूहिक गायन, घड़े और दीपक की प्रस्तुति तथा मिथिला की लोकस्मृति पर ध्यान देना जरूरी है। इसकी सांस्कृतिक अहमियत लोककथाओं को वास्तविक अलौकिक खतरा मानने पर निर्भर नहीं है।

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