खेत में लिया रेत भंडारण का लाइसेंस कांग्रेस नेता ने...

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बिना डायवर्सन के कृषि भूमि पर खनिजों का व्यावसायिक कारोबार करने वालों में एक के बाद एक कई नाम आ रहे हैं। अब इसमें एक कांग्रेस नेता का भी नाम आया है। इन्होंने दूसरे की जमीन पर रेत भंडारण की अनुज्ञा ली है। खनिजों के कारोबार में ऐसी-ऐसी गड़बड़ी सामने आ रही है जो सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठा रही है। कोयले का भंडारण हो, क्रशर हो या कोई गौण खनिज की खदान भूमि के दस्तावेज देखे ही नहीं जाते। सबकुछ सेटिंग में होता है। बिना जमीन किसके नाम पर है, डायवर्सन हुआ या नहीं, सरकारी जमीन पर अतिक्रमण आदि की तस्दीक ही नहीं की जाती। खनिज विभाग तो लीज मांगने वाले कारोबारी का चेहरा देखकर ही भंडारण लाइसेंस दे देता है। डोलोमाइट खदान और कोल डिपो के लीज एरिया कृषि भूमि ही हैं। अब इसमें एक रेत भंडारण का भी नाम जुड़ गया है। सरकार ने रेत को सुलभ बनाने के लिए अस्थाई भंडारण लाइसेंस देने का निर्णय लिया था।
कांग्रेस नेता ने बरमकेला के ग्राम अमोदा में करीब 0.822 हे. रकबे पर रेत का भंडारण लाइसेंस लिया। उनको करीब 2951 टन रेत भंडारण की अनुमति दी गई जिसकी अवधि 10 जून 2020 से 9 जून 2030 तक है। कांग्रेस नेता ने जिन तीन खसरा नंबरों 265/1, 265/2 और 266/2 में लीज ली है। इसमें तीनों ही भूमि दूसरे के नाम पर हैं और सिंचित कृषि भूमि है। खसरा नंबर 265/1, रकबा 0.3560 हे., खसरा नंबर 266/2 रकबा 0.0610 हे. भूमिस्वामी पुरन्दर पिता भुवनेश्वर निवासी झनकपुर और खनं 265/2 रकबा 0.4050 हे. भूमिस्वामी रैबतराम पिता खीरसाय निवासी नवापाली है। सवाल यह है कि कृषि भूमि पर तो रेत का व्यवसाय करने के लिए खनिज और राजस्व विभाग ने कैसे अनुमति दे दी।
खनिज विभाग ने इस रेत भंडारण को मनमाने तरीके से रॉयल्टी जारी की है। लीज लेने की शर्तों का उल्लंघन करने के बावजूद खनिज विभाग संरक्षण में लगा रहा। भंडारण के लिए कहां से रेत लाई गई और कितना परिवहन किया गया। जारी रॉयल्टी और भंडारित रेत की जांच ही नहीं की गई। खनिज अधिकारी अपनी जेब भरने के लिए नियम विरुद्ध रॉयल्टी जारी करते रहे।






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