छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: डॉक्टर पति की प्रताड़ना बनी पत्नी की मौत की वजह, आत्महत्या के लिए मजबूर करने के मामले में बड़ा फैसला.....

ब्रेकिंग ADN न्यूज़ :-
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के एक बेहद संवेदनशील मामले में अहम फैसला सुनाते हुए डॉक्टर पति की संलिप्तता को गंभीर माना है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला को लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से इस हद तक प्रताड़ित किया जाए कि उसके सामने मौत के अलावा कोई दूसरा विकल्प न बचे, तो यह सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (उकसाने) की श्रेणी में आता है।
यह पूरा मामला बिलासपुर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र का है, जहाँ रश्मि नाम की महिला ने अपने घर में संदिग्ध परिस्थितियों में फंदे पर झूलकर जान दे दी थी। घटना के बाद मृतका के भाई ने पति डॉ. संजय पर गंभीर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी कि लगातार मिल रही मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के कारण ही उनकी बहन ने यह खौफनाक कदम उठाया।
निचली अदालत के फैसले को दी गई थी चुनौती -
इस मामले में निचली अदालत ने 28 जून 2016 को फैसला सुनाते हुए आरोपी डॉक्टर को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत दोषी करार देते हुए 3 साल की सजा और 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। हालांकि, निचली अदालत ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ मृतका के परिजनों ने हाईकोर्ट में अपील की, वहीं आरोपी डॉक्टर ने भी अपनी सजा के खिलाफ कोर्ट का रुख किया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने केस के सभी पहलुओं पर बारीकी से विचार किया।
बच्चों के बयान और पारिवारिक कलह बने अहम आधार -
सुनवाई के दौरान मृतका के बेटा रोहित और बेटी तनिष्का के कोर्ट में दिए गए बयान सबसे महत्वपूर्ण साबित हुए। बच्चों ने गवाही दी कि पिता के क्लीनिक पर काम करने वाली एक नर्स के साथ अवैध संबंध थे। जब उनकी मां इसका विरोध करती थी, तो आरोपी उसके साथ मारपीट करता था। इसके अलावा यह बात भी सामने आई कि रश्मि को कथित तौर पर नींद की गोलियां दी जाती थीं और उसे तलाक देकर दूसरी शादी करने की धमकी दी जाती थी।
सुप्रीम कोर्ट के दृष्टांतों का दिया गया हवाला -
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि किसी को आत्महत्या के लिए उकसाने का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि सीधे तौर पर मरने के लिए कहा जाए। यदि किसी के लगातार क्रूर व्यवहार और टॉर्चर से परिस्थितियां ऐसी बन जाएं कि पीड़ित व्यक्ति के पास आत्महत्या के सिवा कोई रास्ता न बचे, तो आरोपी को जिम्मेदार माना जाएगा। इस महत्वपूर्ण फैसले के साथ हाईकोर्ट ने मामले में निचली अदालत के मूल्यांकन से एक अलग और कड़ा दृष्टिकोण अपनाया है।






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