दक्षिण एशिया के 46 करोड़ बच्चे आए भीषण गर्मी की चपेट में........

इस समय दुनियाभर में भीषण गर्मी का प्रकोप चल रहा है। इससे बच्चे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। यूएन के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण अकेले दक्षिण एशिया में तीन-चौथाई बच्चे खतरनाक गर्मी की चपेट में हैं, जिनकी संख्या करीब 46 करोड़ बताई जा रही है। हालांकि कहीं बहुत ज्यादा गर्मी के कारण जंगलों में आग लग रही है तो कहीं लोगों को पानी की कमी से जूझना पड़ रहा है। भारत के भी कई राज्यों में गर्मी और उमस से लोग बेहाल हैं। अपने ठंडे मौसम के लिए पहचाने जाने वाले यूरोप और अमेरिका इस बार एतिहासिक गर्मी का सामना कर रहे हैं। इसी बीच संयुक्त राष्ट्र ने एक डराने वाली चेतावनी जारी की है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ के मुताबिक, मौजूदा समय में दुनिया में सबसे ज्यादा तापमान दक्षिण एशिया में है। जलवायु परिवर्तन के भयंकर असर के कारण इस क्षेत्र के तापमान में असामान्य रूप से बढ़ोतरी हो रही है। इस बढ़ते हुए तापमान का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है।
एक अनुमान के मुताबिक, दक्षिण एशिया में 18 साल से कम उम्र के 76 फीसदी बच्चे भीषण तापमान वाले इलाकों में रहते हैं। इनकी तादाद करीब 46 करोड़ है। यूनिसेफ के मुताबिक, अगर वैश्विक स्तर पर बात की जाए तो हर तीन में से एक बच्चा भीषण गर्मी से प्रभावित है। दक्षिण एशिया के यूनिसेफ के क्षेत्रीय निदेशक संजय विजेसेकेरा के मुताबिक इन दिनों वैश्विक तापमान उबाल पर है। आंकड़ों से साफ है कि दक्षिण एशिया में करोड़ों बच्चों का जीवन हीटवेव और बहुत ज्यादा तापमान के कारण जोखिम में पड़ गया है। यूएन की ओर से जारी चेतावनी के मुताबिक, भारत समेत अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव और पाकिस्तान में जलवायु परिवर्तन के असर के कारण बच्चे ही सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। अनुमान है कि दक्षिण एशिया के इन देशों में हर साल कम से कम 83 दिन 35 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान रहता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे अपने शरीर को इतने ज्यादा तापमान के मुताबिक ढालने में सक्षम नहीं होते हैं। बच्चों में जलवायु परिवर्तन के साथ अपने शरीर के तापमान को ढालने की क्षमता नहीं होती है। विजेसेकेरा का कहना है कि छोटे बच्चे ज्यादा गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। वहीं, भविष्य में ये बच्चे ज्यादा से ज्यादा बार और अब से भी ज्यादा भीषण गर्मी झेलने को मजबूर होंगे। उन्होंने कहा कि पारंपरिक जीवाश्म ईंधन के बहुत ज्यादा इस्तेमाल के कारण ग्लोबल वार्मिंग ने हीटवेव को ज्यादा गर्म, ज्यादा लंबा और ज्यादा बार वाला बना दिया है। इसके अलावा तूफान और बाढ़ जैसी दूसरी मौसम की चरम स्थितियों को भी तेज कर दिया है।






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